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हर फोन में बेसिक चीजें एक जैसी, फिर भी कोई 10 हजार का तो कोई 3 लाख का क्यों? ये है असली वजह

आज बाजार में स्मार्टफोन की कीमत 10 हजार रुपये से शुरू होकर लाखों रुपये तक पहुंच जाती है. दिलचस्प बात यह है कि लगभग हर फोन में कॉलिंग, इंटरनेट, कैमरा, बड़ी टच स्क्रीन, ऐप्स और बैटरी जैसी बेसिक चीजें मौजूद होती हैं. फिर आखिर एक फोन 10-15 हजार रुपये में और दूसरा 1-3 लाख रुपये में क्यों बिकता है? इसका जवाब सिर्फ ब्रांड नाम में नहीं छिपा है. फोन की कीमत तय करने में प्रोसेसर, कैमरा, डिस्प्ले, बिल्ड क्वालिटी, स्टोरेज, सॉफ्टवेयर, रिसर्च और यहां तक कि ब्रांड की मार्केट पोजिशनिंग भी बड़ी भूमिका निभाती है.

प्रोसेसर और हार्डवेयर का बड़ा अंतर
दो स्मार्टफोन बाहर से देखने में भले ही एक जैसे लगें, लेकिन उनके अंदर इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर में काफी अंतर होता है. सस्ते फोन में आमतौर पर ऐसे प्रोसेसर और कंपोनेंट लगाए जाते हैं जो रोजमर्रा के काम जैसे कॉलिंग, सोशल मीडिया और वीडियो देखने के लिए पर्याप्त होते हैं. महंगे फोन में ज्यादा पावरफुल प्रोसेसर इस्तेमाल किए जाते हैं, जो गेमिंग, कैमरा प्रोसेसिंग, एआई फीचर्स और दूसरी हैवी जरूरतों को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं. इसी तरह ज्यादा रैम और तेज स्टोरेज भी फोन की कीमत बढ़ाते हैं. यानी सिर्फ फोन का बाहरी डिजाइन देखने से उसकी वास्तविक हार्डवेयर क्षमता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

कैमरा सिर्फ मेगापिक्सल का खेल नहीं
आज फोन खरीदते समय कैमरा सबसे बड़ा फैक्टर होता है. लेकिन 50MP या 200MP लिखे होने का मतलब यह नहीं है कि दोनों फोन की फोटो क्वालिटी एक जैसी होगी. महंगे फोन में बेहतर सेंसर, लेंस, इमेज प्रोसेसिंग और अलग-अलग कैमरा सिस्टम पर ज्यादा खर्च किया जाता है. लो-लाइट फोटोग्राफी, जूम, वीडियो रिकॉर्डिंग और रंगों को बेहतर दिखाने के लिए भी ज्यादा तकनीक की जरूरत होती है. यही वजह है कि कम मेगापिक्सल वाला महंगा फोन कई बार ज्यादा मेगापिक्सल वाले सस्ते फोन से बेहतर फोटो दे सकता है. महंगे फोन के कैमरा फोन कई बार DSLR जैसे कैमरे का विकल्प बन जाते हैं.

डिस्प्ले और बिल्ड क्वालिटी भी बढ़ाती है कीमत
स्मार्टफोन की स्क्रीन भी उसकी कीमत में बड़ा योगदान देती है. सस्ते फोन में अच्छी स्क्रीन मिल सकती है, लेकिन महंगे मॉडल में बेहतर एमोलेड पैनल, ज्यादा रेजोल्यूशन, ज्यादा ब्राइटनेस और बेहतर रिफ्रेश रेट जैसी खूबियां मिलती हैं. इसके अलावा इसमें डिस्प्ले प्रोटेक्शन भी मिलता है. इसके अलावा फोन की बॉडी में इस्तेमाल होने वाला मटेरियल भी कीमत को प्रभावित करता है. प्लास्टिक बॉडी की तुलना में ग्लास, मेटल या दूसरे प्रीमियम मटेरियल की लागत ज्यादा हो सकती है. वाटर और डस्ट रेजिस्टेंस के लिए भी कंपनियों को अतिरिक्त हार्डवेयर और टेस्टिंग पर खर्च करना पड़ता है.

सॉफ्टवेयर और लंबे अपडेट की भी कीमत
फोन सिर्फ हार्डवेयर से नहीं बनता. उसके पीछे सॉफ्टवेयर तैयार करने, उसे बेहतर बनाने और लंबे समय तक अपडेट देने में भी कंपनियों का पैसा खर्च होता है. महंगे फोन में कई बार ज्यादा एआई फीचर्स, बेहतर कैमरा प्रोसेसिंग, कस्टम सॉफ्टवेयर फीचर्स और लंबे समय तक अपडेट मिलते हैं. इन फीचर्स को तैयार करने के लिए रिसर्च और डेवलपमेंट पर काफी निवेश करना पड़ता है. इसलिए एक फोन की कीमत में सिर्फ उसके पार्ट्स की लागत शामिल नहीं होती, बल्कि उसके सॉफ्टवेयर और उसे लगातार बेहतर बनाने की लागत भी जुड़ी होती है.

ब्रांड की कीमत भी होती है
अब सबसे बड़ा सवाल कि कुछ फोन लाखों रुपये तक क्यों पहुंच जाते हैं? यहां ब्रांड की पोजिशनिंग भी काम करती है. प्रीमियम कंपनियां सिर्फ फोन नहीं बेचतीं, बल्कि डिजाइन, मटेरियल, एक्सक्लूसिव फीचर्स और ब्रांड वैल्यू को भी बेचती हैं. महंगे फोन बनाने वाली कंपनियां सीमित मॉडल, खास डिजाइन और प्रीमियम अनुभव पर ज्यादा ध्यान देती हैं. इसके अलावा विज्ञापन, रिसर्च, सर्विस नेटवर्क, डिस्ट्रीब्यूशन और रिटेल मार्जिन जैसी लागत भी फोन की अंतिम कीमत में जुड़ती है.

यानी 10 हजार और 3 लाख रुपये के फोन में बेसिक काम भले ही एक जैसे हों, लेकिन दोनों के पीछे इस्तेमाल होने वाली तकनीक, हार्डवेयर, कैमरा, स्क्रीन, मटेरियल, सॉफ्टवेयर और ब्रांड पोजिशनिंग में बड़ा अंतर हो सकता है. यही वजह है कि सिर्फ फीचर्स की संख्या देखकर फोन की कीमत को समझना सही नहीं है. असली अंतर इस बात में होता है कि वही काम फोन कितनी तेजी, क्वालिटी और लंबे समय तक करता है.

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