Chhattisgarh

KORBA:दिवाली की तैयारी में जुटे कुम्हार परिवार, बाजार में बढ़ी मिट्टी के दीयों की मांग

महंगाई और मिट्टी की कमी से बढ़ी दीये बनाने की लागत, पुश्तैनी कला को सहेजने में जुटे कुम्हार

कोरबा,02 नवम्बर 2026। दीपावली पर्व को लेकर कोरबा जिले के नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कुम्हार परिवारों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। पारंपरिक मिट्टी के दीयों को आकार देने से लेकर उन्हें पकाने और बाजार तक पहुंचाने का काम इन दिनों जोर-शोर से चल रहा है। आर्टिफिशियल दीयों और रंग-बिरंगी चाइनीज झालर लाइट्स की बढ़ती उपलब्धता के बावजूद मिट्टी के दीयों की मांग बरकरार है। यही वजह है कि नगर के बाजारों और प्रमुख चौक-चौराहों पर कुम्हार परिवारों द्वारा तैयार किए गए मिट्टी के दीयों की बिक्री शुरू हो गई है।

दीपावली का पांच दिवसीय उत्सव 6 नवंबर को धनतेरस के साथ शुरू होगा। 8 नवंबर को बड़ी दीपावली पर घरों, प्रतिष्ठानों और संस्थानों में मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाएगी। दीपोत्सव का समापन 11 नवंबर को होगा। पर्व को ध्यान में रखते हुए कुम्हार परिवारों ने लगभग एक महीने पहले से ही दीये बनाने का काम शुरू कर दिया था, ताकि दीपावली से पहले बाजार में पर्याप्त संख्या में दीये उपलब्ध कराए जा सकें।

हालांकि, इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े परिवारों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। महंगाई के कारण दीये बनाने की लागत लगातार बढ़ रही है। सबसे बड़ी समस्या पर्याप्त मात्रा में मिट्टी उपलब्ध नहीं होना है। पहले जहां आसपास के क्षेत्रों से आसानी से मिट्टी मिल जाती थी, वहीं अब कुम्हारों को मिट्टी की व्यवस्था करने के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। ट्रैक्टर के माध्यम से मिट्टी मंगवाने पर परिवहन लागत बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर उनके मुनाफे पर पड़ता है। इसके अलावा दीयों और मिट्टी के बर्तनों को पकाने में भी काफी समय और मेहनत लगती है।

कुम्हार ओम लाल ने बताया कि उनका पूरा परिवार पिछले एक महीने से दीपावली के लिए मिट्टी के दीये बनाने में जुटा हुआ है। पर्याप्त मिट्टी नहीं मिलने के कारण काम में परेशानी होती है। ट्रैक्टर से मिट्टी मंगवाने पर खर्च बढ़ जाता है। इसके बावजूद परिवार के सभी सदस्य मिलकर पारंपरिक तरीके से दीये और मिट्टी के बर्तन तैयार कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मिट्टी के बर्तन और दीये बनाना उनके परिवार का पुश्तैनी व्यवसाय है। यह कला उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है, जिसे परिवार आज भी सहेजने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, बदलते समय और आर्थिक चुनौतियों के कारण अब क्षेत्र में गिने-चुने कुम्हार परिवार ही इस पारंपरिक काम से जुड़े हुए हैं।

कुम्हार परिवारों को उम्मीद है कि दीपावली के दौरान लोग स्वदेशी और पारंपरिक मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता देंगे। इससे न केवल उनकी आजीविका को सहारा मिलेगा, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही इस पारंपरिक कला को भी संरक्षण मिल सकेगा।

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