कोरबा में ‘श्रीरामचरितमानस से मानव चरित्र निर्माण’ पर विशेष व्याख्यान, पं. देवशरण दुबे ने कैकेयी, भरत और शत्रुघ्न के चरित्र से बताए जीवन के आदर्श

कोरबा, 27 सितम्बर । कोरबा के महानदी कॉम्प्लेक्स परिसर स्थित गणेश पंडाल में सर्वधर्मार्थ कल्याण सेवा समिति एवं निहारिका गणेशोत्सव समिति के संयुक्त आयोजन में “श्रीरामचरितमानस से मानव चरित्र निर्माण” विषय पर एक दिवसीय विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मानस एवं भागवत मर्मज्ञ पंडित देवशरण दुबे ने रामायण के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से मानव जीवन में त्याग, कर्तव्य, संस्कार, माता-पिता के सम्मान और धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला।
पंडित देवशरण दुबे ने भगवान श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि रामायण में शत्रुघ्न का त्याग सबसे अधिक उपेक्षित रहा है। उन्होंने कहा कि जहां भगवान श्रीराम वनवास गए, लक्ष्मण उनके साथ रहे और भरत ने नंदीग्राम में तपस्वी जीवन बिताया, वहीं शत्रुघ्न ने परिवार और राजकीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए मौन तपस्या की। बिना यश और प्रसिद्धि की इच्छा के परिवार और समाज के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना शत्रुघ्न के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है।
भरत के चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भरत त्याग, भक्ति और धर्मनिष्ठा के अनुपम उदाहरण हैं। हालांकि, रामायण का एक प्रसंग यह भी सिखाता है कि माता के प्रति अपमानजनक व्यवहार उचित नहीं है। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीराम के वनवास और महाराज दशरथ के निधन का समाचार मिलने पर भरत अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए तथा अपनी माता कैकेयी के प्रति कठोर वचन कह बैठे। व्याख्यान में इस प्रसंग को माता के अपमान से जुड़े कर्मफल की सीख के रूप में प्रस्तुत किया गया।

पंडित दुबे ने कहा कि माता केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि संतान की प्रथम गुरु और ईश्वर के स्वरूप के समान होती है। माता-पिता का सम्मान, सेवा और उनके प्रति कृतज्ञता प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण संस्कार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भरत का जीवन यह संदेश देता है कि भूल होने पर पश्चाताप, विनम्रता और धर्म के मार्ग पर चलकर व्यक्ति अपने जीवन को महान बना सकता है।
व्याख्यान में माता कैकेयी के चरित्र को भी विशेष रूप से रेखांकित किया गया। पंडित देवशरण दुबे ने कहा कि कैकेयी के चरित्र को केवल राम के वनवास के प्रसंग से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने “स्वयं गरल का पान किया, जग को अमिय पिलाया” गीत के माध्यम से कैकेयी के त्याग और बलिदान का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि रामकथा को समझने के लिए कैकेयी के चरित्र और उनके निर्णयों को भी समझना आवश्यक है।
पंडित दुबे ने कहा कि भगवान श्रीराम के पालन-पोषण में माता कैकेयी का भी महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने राम के प्रति कैकेयी के स्नेह और ममता से जुड़े कथा प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि कैकेयी ने श्रीराम के प्रति गहरा प्रेम रखा। उन्होंने कहा कि राजा दशरथ से प्राप्त वरदानों के आधार पर श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास दिलाने का निर्णय कैकेयी के लिए भी आसान नहीं था, क्योंकि इसके कारण उन्हें जीवनभर लोकनिंदा और अपमान सहना पड़ा।
उन्होंने कहा कि रामकथा के इन प्रसंगों में त्याग, कर्तव्य और व्यापक कल्याण का संदेश निहित है। माता-पिता द्वारा संतान के हित में लिए गए कई निर्णय तत्काल समझ में नहीं आते, लेकिन समय के साथ उनके पीछे छिपे प्रेम, त्याग और दूरदर्शिता को समझा जा सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से माता-पिता का सम्मान करने और परिवार में संस्कार एवं विश्वास बनाए रखने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में सर्वधर्मार्थ कल्याण सेवा समिति के कोरबा जिला शाखा प्रभारी डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा ने भी अपने विचार रखे। आयोजन को सफल बनाने में निहारिका गणेशोत्सव समिति, सर्वधर्मार्थ कल्याण सेवा समिति और अंचलवासियों का विशेष योगदान रहा।




