Chhattisgarh

लक्ष्मीपूजन के साथ आज से हुई अगहन माह की शुरूआत

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

रायपुर – हिन्दू कैलेंडर के नौंवें महीने अगहन माह की शुरूआत गुरूवार यानि आज से विशेष महत्व के साथ हुई। हिन्दू पंचांग में हर माह का अपना अलग ही महत्व है। शास्त्रों के अनुसार अगहन माह में मांँ लक्ष्मी की उपासना शुभ फलदायी होती है।

इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये श्री सुदर्शन संस्थानम , पुरी शंकराचार्य आश्रम / मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने बताया कि इस माह जो सुहागन लक्ष्मी की श्रद्धा से उपासना करती हैं , उनके घर में धन के साथ खुशहाली आती है। साथ ही लक्ष्मी और तुलसी साथ में पूजी जाती है। इसके चलते परिवार में लक्ष्मी का वास हमेशा रहता है। अगहन मास श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इस माह को भगवान ने स्वयं की ही संज्ञा दी है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुख से कहते हैं कि मैं मार्गशीर्ष माह हूंँ , इसलिये इस महीने में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने , स्नान , दान और दीपदान करने का बड़ा महत्व है। यही वजह है कि मार्गशीर्ष महीने का विशेष धार्मिक महत्व है , इस महीने में किये गये पुण्य कार्य पापों का नाश करते हैं और मनुष्य के लिये मोक्ष पाने के दरवाजे खोलते हैं। इस पवित्र महीने में मुख्य रूप से नित्य ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें , इससे जीवन में सुख , सौभाग्य और समृद्धि आती है। माता लक्ष्मी की पूजा से घर में धन और ऐश्वर्य का वास होता है।

इस माह में तुलसी की पूजा का विशेष महत्व है , तुलसीजी को जल अर्पित करें और उनकी परिक्रमा करें। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूजा करने का विधान है , जिससे मानसिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है। मार्गशीर्ष माह में दीपदान का विशेष महत्व है , शाम के समय तुलसी के पौधे के पास और मंदिर में दीपक अवश्य जलाना चाहिये ,यह कर्म जीवन में प्रकाश और सकारात्मकता लाता है। इस महीने में सामर्थ्य अनुसार अन्न , वस्त्र , कम्बल , गुड़ और तिल का दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस बार अगहन माह आज 06 नवम्बर से शुरू होकर 04 दिसंबर तक चलेगा जिसमें 06 नवम्बर , 13 नवम्बर , 20 नवम्बर , 27 नवम्बर और 04 दिसम्बर कुल पांच गुरूवार पड़़ेंगे। मान्यताओं के आधार पर अगहन गुरुवार में व्रत रखने का विधान है। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प किया जाता है। शाम को चंद्रमा के उदित होने के उपरांत पुष्प , नैवेद्य , धूम , दीप प्रज्वलित कर पूजा की जाती है।

सजाये गये घर-द्वार

महिलाओं ने घर-द्वार सजाने के साथ ही पूजा की तैयारी बुधवार से ही शुरू कर ली थी। बुधवार को महिलायें घर के द्वार से लेकर पूजा स्थल तक चाँवल आटे के घोल से मांँ लक्ष्मी के पद चिन्ह बनायी। गुरुवार की सुबह सूर्य निकलने से पहले महिलायें स्नान-ध्यान कर घर के द्वार पर दीप प्रज्वलित कर मांँ लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की। वहीं महिलाओं ने माँ लक्ष्मी के स्वागत के लिये घर का द्वार खोल दिया था। सुबह में शंख , घंटी बजाकर आरती के साथ माता लक्ष्मी का स्वागत किया। यही क्रम पूरे अगहन माह हर गुरूवार दोपहर व शाम को भी चलेगा।

अगहन गुरुवार की मान्यता

मान्यता है कि अगहन गुरुवार में मांँ लक्ष्मी पृथ्वी लोक का विचरण करने आती हैं। गुरुवार को इनका आगमन ऐसे भक्त के यहां होता है जिनके घर में साफ-सफाई , सजावट व मन – वचन और कर्म से पूरी सात्विकता रहती है। यही वजह है कि महिलायें हर बुधवार को घर-द्वारा को रंगोली से सजा कर मांँ पूजा स्थल तक देवी के पग चिन्ह बना कर गुरुवार को भोर में उनका आह्वान करते हैं। इस अवसर पर जो श्रद्धालु घर-द्वार की विशेष साज-सज्जा के साथ मांँ लक्ष्मी की विधिवत पूजा-अर्चना करता है , उसे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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