भारत को माइनिंग सेक्टर में ऑस्ट्रेलिया से सीखने की जरूरत: अनिल अग्रवाल

नई दिल्ली। वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने भारत के माइनिंग सेक्टर और सरकारी नीतियों को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि यदि भारत को लौह अयस्क उत्पादन के क्षेत्र में दुनिया का अग्रणी देश बनना है, तो सरकार को केवल राजस्व बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना होगा। उन्होंने इस संबंध में ऑस्ट्रेलिया की खनन कंपनी फोर्टेस्क्यू का उदाहरण दिया।
अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि फोर्टेस्क्यू की स्थापना करीब 20 वर्ष पहले हुई थी और आज यह कंपनी अकेले हर साल 200 मिलियन टन से अधिक लौह अयस्क का उत्पादन कर रही है। इसके मुकाबले भारत का कुल लौह अयस्क उत्पादन करीब 300 मिलियन टन है। उन्होंने कहा कि भारत की भौगोलिक स्थिति ऑस्ट्रेलिया की तुलना में काफी बेहतर है और देश में लौह अयस्क के क्षेत्र में अग्रणी उत्पादक बनने की पर्याप्त क्षमता मौजूद है।
उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में लौह अयस्क की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत के पास भी इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्पादन बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने की क्षमता है। उन्होंने फोर्टेस्क्यू की सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि रिकॉर्ड लौह अयस्क उत्पादन, मजबूत शिपमेंट और बेहतर कीमतों ने कंपनी के मुनाफे को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सरकारी नीतियों पर जोर देते हुए अग्रवाल ने कहा कि सरकार को ‘रेवेन्यू-माइंडेड’ के बजाय ‘प्रोडक्शन-माइंडेड’ सोच अपनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारी प्रीमियम वसूलने के बजाय सरकार का लक्ष्य अधिक से अधिक उत्पादन सुनिश्चित करना होना चाहिए।
अग्रवाल के मुताबिक लौह अयस्क खनन के लिए बुनियादी ढांचे के विकास में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है, जिसे मुख्य रूप से बड़े खिलाड़ी ही कर सकते हैं। इसलिए भारत को भी ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर तीन-चार बड़े और मजबूत उत्पादकों को विकसित करने की जरूरत है।
उन्होंने दावा किया कि यदि देश में बड़े खनन खिलाड़ियों को बढ़ावा दिया जाता है, तो भारत का लौह अयस्क उत्पादन तीन गुना तक बढ़ सकता है। इससे देश को आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी और 300 मिलियन टन वार्षिक इस्पात उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने में भी सहायता मिलेगी।




