चक्रधर समारोह में गूंजी पंडवानी की ओजस्वी गाथा, पद्मश्री उषा बारले ने महाभारत प्रसंगों से बांधा समां

रायगढ़, 14 सितंबर 2026। 41वें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चक्रधर समारोह का आगाज छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति की शानदार झलक के साथ हुआ। समारोह के पहले दिन पद्मश्री डॉ. उषा बारले ने पंडवानी की प्रभावशाली प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। हाथ में तंबूरा लेकर कपालिक शैली में उन्होंने महाभारत के विभिन्न प्रसंगों का ओजस्वी और भावपूर्ण गायन किया।
डॉ. उषा बारले ने अपनी विशिष्ट गायन शैली के माध्यम से महाभारत के प्रसंगों को जीवंत कर दिया। द्रौपदी चीरहरण, कीचक वध और ‘अमर कथा’ जैसे प्रसंगों ने दर्शकों को विशेष रूप से प्रभावित किया। उनकी प्रस्तुति के दौरान रामलीला मैदान में मौजूद दर्शक लोकगायन की इस पारंपरिक विधा में पूरी तरह डूबे नजर आए। प्रस्तुति के बाद दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकार का उत्साहवर्धन किया।
7 वर्ष की उम्र से साध रहीं पंडवानी
पद्मश्री डॉ. उषा बारले ने महज सात वर्ष की उम्र में स्व. मेहत्तर दास बघेल से पंडवानी गायकी की शिक्षा लेना शुरू किया था। बाद में उन्होंने पंडवानी की महान कलाकार डॉ. तीजन बाई से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी पंडवानी की प्रस्तुतियां देकर उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोककला और संस्कृति को व्यापक पहचान दिलाई है।
पंडवानी के अलावा डॉ. उषा बारले पंथी गीत, सतनाम भजन और चौका आरती जैसी लोक विधाओं में भी पारंगत हैं। लोककला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2023 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था। चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं की समृद्ध विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर रेखांकित किया।




