Chhattisgarh

CG High Court: फेसबुक पर दोस्ती के बाद मंदिर में शादी, सात फेरे नहीं होने पर विवाह शून्य घोषित करने की मांग खारिज, हाईकोर्ट का अहम फैसला

बिलासपुर, 17 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फेसबुक पर दोस्ती के बाद मंदिर में हुई शादी को सात फेरे नहीं होने के आधार पर शून्य घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के कानूनी आधार सीमित हैं। केवल विवाह की रस्मों को लेकर विवाद होने से इस धारा के अंतर्गत शादी को अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता। जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए पति की मूल याचिका भी खारिज कर दी।

मामला जांजगीर-चांपा जिले के रहौद क्षेत्र का है, जहां रहने वाले युवक और युवती की पहचान फेसबुक के माध्यम से हुई थी। बातचीत के दौरान दोनों के बीच प्रेम संबंध विकसित हुए और मामला शादी तक पहुंच गया। युवक के अनुसार, उसने युवती के परिजनों से मुलाकात के दौरान स्पष्ट किया था कि वह पहले अपने परिवार की सहमति लेना चाहता है।

युवक ने आरोप लगाया कि 3 फरवरी 2022 को उसे युवती के घर बुलाया गया, जहां शादी के लिए दबाव बनाया गया। आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देकर विवाह संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। इसके बाद चिरमिरी स्थित शिव मंदिर में जल्दबाजी में शादी कराई गई। युवक का दावा था कि विवाह के दौरान हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार सप्तपदी यानी अग्नि के समक्ष सात कदम लेने की रस्म पूरी नहीं हुई थी। इसी आधार पर उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत किया था।

दूसरी ओर, युवती ने युवक के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि दोनों का विवाह हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ था। शादी के बाद युवक ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया और दोनों लगभग डेढ़ महीने तक साथ रहे। युवती ने यह भी आरोप लगाया कि भरण-पोषण संबंधी कार्यवाही से बचने के उद्देश्य से युवक विवाह को अमान्य घोषित कराने का प्रयास कर रहा है।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने आवेदन की कानूनी स्वीकार्यता की जांच करने के बजाय विवाह की रस्मों और उसकी वैधता पर निर्णय दे दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत विवाह को शून्य घोषित करने के लिए धारा 5 की संबंधित शर्तों का उल्लंघन होना आवश्यक है।

डिवीजन बेंच ने कहा कि विवाह की रस्में पूरी हुईं या नहीं, इस विवाद के आधार पर धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। इसी कानूनी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें विवाह को वैध बताया गया था। हालांकि, पति को भी कोई राहत नहीं मिली और उसकी मूल याचिका सुनवाई योग्य नहीं होने के कारण खारिज कर दी गई।

हाईकोर्ट का यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के कानूनी प्रावधानों की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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