‘दृश्यम 3’ को लेकर अभिषेक पाठक का खुलासा, बोले – फिल्म के आखिरी भाग के लिए अपनी ओरिजिनल कहानी लिखना चाहता था

मुंबई। निर्देशक अभिषेक पाठक की फिल्म ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ ने दुनियाभर में 560 करोड़ रुपये से ज्यादा का कलेक्शन किया है। इस सफलता के साथ फिल्म ने फैमिली थ्रिलर फिल्मों के लिए एक नया मुकाम स्थापित किया है। ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ हिंदी ‘दृश्यम’ फ्रेंचाइजी की तीसरी और आखिरी कड़ी है। निर्देशक अभिषेक पाठक ने इस फिल्म में विजय सालगांवकर की कहानी को इस तरह पेश किया कि दर्शक अंत तक घटनाक्रम से जुड़े रहें।
अभिषेक पाठक का हिंदी ‘दृश्यम’ फ्रेंचाइजी से जुड़ाव पहली फिल्म के निर्माता के रूप में शुरू हुआ था। इसके बाद उन्होंने ‘दृश्यम 2’ का निर्देशन किया। हालांकि, तीसरी फिल्म के लिए वह मलयालम फिल्म का रीमेक बनाने के बजाय अपनी मौलिक कहानी पेश करना चाहते थे।
अभिषेक पाठक ने बताया, “दृश्यम 2 के बाद मैंने सोचा कि हमें मलयालम फिल्म का रीमेक बनाने के बजाय अपनी कहानी लिखनी चाहिए, भले ही इसमें कितना भी समय क्यों न लगे। हमने इसकी पटकथा लिखने में करीब दो साल लगाए और एक नई कहानी तैयार की।” इस फिल्म की पटकथा लिखने में अभिषेक पाठक ने भी योगदान दिया है।
उन्होंने आगे कहा, “मैं इस फिल्म को अपना बनाना चाहता था। अक्सर किसी फिल्म को उसमें किए गए काम और रचनात्मकता को समझे बिना ही ‘रीमेक’ का टैग दे दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब मार्टिन स्कॉर्सेसी ने ‘इनफर्नल अफेयर्स’ से ‘द डिपार्टेड’ बनाई, तो लोगों ने इस बात की चर्चा की कि फिल्म कितनी शानदार तरीके से बनाई गई है।”
अभिषेक ने बताया कि उन्हें भरोसा था कि फिल्म दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल होगी। इसलिए उन्होंने फ्रेंचाइजी को एक शानदार अंत देने का फैसला किया।
फिल्म के अंतिम भाग को बनाते समय अभिषेक पाठक इस बात से अच्छी तरह परिचित थे कि विजय सालगांवकर भले ही बार-बार नियमों को अपने तरीके से मोड़ता है, लेकिन उसके हर कदम के पीछे अपनी पत्नी और बेटियों को सुरक्षित रखने की वजह होती है। फिल्म में रोमांच और भावनात्मक संघर्ष के बीच संतुलन बनाए रखना उनके लिए बेहद जरूरी था।
इस बारे में उन्होंने कहा, “हमने ‘दृश्यम’ की मूल भावना को बरकरार रखा। हम लेखन में कुछ अलग करना चाहते थे, लेकिन फिल्म की उस भावना से दूर नहीं जाना चाहते थे, जिसका केंद्र परिवार है। यह एक साधारण आदमी की कहानी है, जो अपने परिवार को बचाने के लिए हर संभव कोशिश करता है। हमने इस भावना को कभी नहीं छोड़ा और मुझे लगता है कि यही बात इस फ्रेंचाइजी के लिए, खासकर इसके आखिरी भाग में, शानदार तरीके से काम आई।”
फिल्म में हिंदी सिनेमा के उस पारंपरिक विचार को भी दोहराया गया है कि ‘हीरो जेल नहीं जाता’, जिसे सौरभ शुक्ला के किरदार के जरिए सामने रखा गया है। हालांकि, अभिषेक पाठक का कहना है कि इसे हिंदी सिनेमा की परंपराओं पर टिप्पणी के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे विजय सालगांवकर की असाधारण परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए।
उन्होंने कहा, “विजय की कहानी में हीरो कभी जेल नहीं जाता, क्योंकि वह अपनी कहानी खुद लिख रहा है। अगर वह जेल चला गया, तो उसका परिवार बर्बाद हो जाएगा। इसलिए वह ऐसा होने से रोकने के लिए हर संभव तरकीब अपनाता है।” फिल्म की व्यावसायिक सफलता से अभिषेक पाठक बेहद खुश और अभिभूत हैं।
अजय देवगन, श्रिया सरन, जयदीप अहलावत और प्रकाश राज जैसे अनुभवी कलाकारों के साथ काम करने के अनुभव पर बात करते हुए अभिषेक ने कहा कि उनका काम कलाकारों को संभालने से ज्यादा यह सुनिश्चित करना था कि सभी एक ही लक्ष्य की दिशा में काम करें।
उन्होंने कहा, “ये सभी कलाकार अपने साथ काफी अनुभव लेकर आते हैं। मुझे उन्हें सिर्फ यह समझाना होता है कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं। जब सभी एक बात पर सहमत हो जाते हैं, तो वे अपना काम बखूबी करते हैं।”
अपने पिता कुमार मंगत पाठक के साथ निर्माता के रूप में काम करने और ‘ओमकारा’, ‘प्यार का पंचनामा’ जैसी फिल्मों में प्रोडक्शन इंटर्न के तौर पर करियर शुरू करने वाले अभिषेक का कहना है कि वह निर्देशक और निर्माता की भूमिकाओं को एक साथ निभाने से बचने की कोशिश करते हैं। निर्देशक के तौर पर उनका पूरा ध्यान रचनात्मक प्रक्रिया पर रहता है और वह निर्माता की भूमिका में तभी आते हैं, जब किसी फैसले के लिए इसकी जरूरत होती है।
फिल्म को लिखने और बनाने में लगातार दो साल बिताने के बाद फिलहाल अभिषेक पाठक ब्रेक ले रहे हैं। हालांकि, वह जल्द ही लेखन की दुनिया में वापसी करने की योजना बना रहे हैं।
उन्होंने बताया, “फिलहाल मैं कुछ अलग-अलग जॉनर के साथ प्रयोग कर रहा हूं। अगले दो महीनों में मैं अपने नए प्रोजेक्ट की घोषणा करूंगा।”



