Chhattisgarh

बस्तर दशहरा में अनोखी बेल पूजा की रस्म, जोड़ी बेल फल से जुड़ी है देवी दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी की रोचक कथा

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं और सदियों पुरानी रस्मों के लिए जाना जाता है। 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में अष्टमी के दिन बेल पूजा की रस्म निभाई गई। जगदलपुर से करीब 6 किलोमीटर दूर सरगीपाल गांव में होने वाली इस पूजा का खास महत्व है। मान्यता है कि यहां जोड़ी बेल फल के माध्यम से मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी को आमंत्रित किया जाता है। इस परंपरा के पीछे एक रोचक पौराणिक कथा भी जुड़ी है, जिसे आज भी बस्तर राजपरिवार पूरी श्रद्धा के साथ निभाता आ रहा है।

सरगीपाल गांव में बेल पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है। बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, इस रस्म का संबंध चालुक्य वंश के एक राजा की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि राजा शिकार के दौरान बेल वृक्ष के नीचे दो सुंदर कन्याओं से मिले और उनसे विवाह की इच्छा जताई। कन्याओं ने राजा को बारात लेकर आने को कहा, लेकिन अगले दिन जब राजा बारात लेकर पहुंचे, तो उन्होंने स्वयं को मां माणिकेश्वरी और मां दंतेश्वरी बताया। इस घटना के बाद राजा ने क्षमा मांगते हुए दोनों देवियों को बस्तर दशहरा में शामिल होने का निमंत्रण दिया। तभी से बेल पूजा की परंपरा निभाई जा रही है।

जोड़ी बेल फल को माना जाता है दोनों देवियों का प्रतीक

जानकार हेमंत कश्यप बताते हैं कि जोड़ी बेल फल को दोनों देवियों का प्रतीक माना जाता है। हर साल बेल न्योता के दौरान राजपरिवार के सदस्य सरगीपाल पहुंचते हैं और पुजारी से विधि-विधान के साथ जोड़ी बेल फल ग्रहण करते हैं। इसके बाद इसे जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ रखा जाता है।

पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई पूजा

रविवार को भी यह रस्म उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई। गांव में उत्सव जैसा माहौल रहा, जहां राजपरिवार के सदस्यों, दशहरा समिति और बड़ी संख्या में ग्रामीणों की मौजूदगी रही। बस्तर दशहरा में 12 से अधिक अनूठी रस्में निभाई जाती हैं, जो इस पर्व की सांस्कृतिक विरासत को खास बनाती हैं। सप्तमी पर बेल पूजा के बाद अब सोमवार को महाअष्टमी की रात निशा जात्रा की रस्म अदा की जाएगी।

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