पर्युषण का मूल आधार है प्रेम, समस्त जीवों से प्रेम ही अहिंसा का सार: मुनि संवेगरत्न सागर

पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन मुनिश्री ने समझाया अहिंसा का प्रथम कर्तव्य
रायपुर , 09 सितंबर। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास के अंतर्गत 8 सितंबर से पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की शुरुआत हुई। आत्मशुद्धि और संयम के इस महापर्व के प्रथम दिन धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने पर्युषण के प्रथम कर्तव्य अहिंसा का महत्व समझाया। मुनिश्री ने कहा कि पर्युषण केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांककर जीवन में प्रेम, करुणा और अहिंसा को उतारने का अवसर है।
मुनिश्री ने कहा कि सबसे पहले हिंसा का त्याग करना आवश्यक है। हिंसा का त्याग केवल व्यवहार में नहीं, बल्कि द्रव्य और भाव दोनों स्तरों पर होना चाहिए। मन में किसी के प्रति वैर, द्वेष या कटुता रखना भी भाव हिंसा है। इसलिए पर्युषण में बाहरी आचरण के साथ मन की शुद्धि पर भी ध्यान देना जरूरी है। विचारों में प्रेम और व्यवहार में करुणा आएगी, तभी अहिंसा का वास्तविक पालन होगा।
प्रेम को केंद्र में लाएंगे तो पाप का क्षय होगा
मुनिश्री ने कहा कि प्रेम ही पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व का मूल आधार है। जिसने प्रेम को अपने जीवन के केंद्र में ला लिया, उसके पाप का क्षय और पुण्य का पोषण होगा। मुनिश्री ने धर्मसभा में श्रावक-श्राविकाओं से आत्ममंथन कराते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसने अपने जीवन में कितने लोगों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार किया है ?
मुनिश्री ने कहा कि पुण्य का पोषण करने वाला प्रेम है। प्रेम केवल सधार्मिकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी जीवों के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार होना चाहिए। पर्युषण के आठों दिन की आराधना का आधार प्रेम है। जब तक प्रेम का विस्तार नहीं करेंगे और प्रेम का दान नहीं करेंगे, तब तक आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना कठिन है।
जीव मात्र से प्रेम करने वाला ही सच्चा साधु
मुनिश्री ने कहा कि जो जीव मात्र से प्रेम करता है, वही सच्चे अर्थों में साधु है। सामायिक और पौषध जैसी आराधनाएं भी जीवों के प्रति प्रेम और अहिंसा का उद्घोष हैं। मुनिश्री ने कहा कि जिसने प्रेम बांटने में कंजूसी की, उसके जीवन में पुण्य आने में भी कंजूसी होगी। वहीं जिसने दिल खोलकर प्रेम का विस्तार किया, उसके जीवन में सुख-समृद्धि का भी विस्तार होगा।
मुनिश्री ने कहा कि पर्युषण पर्व का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह स्वयं में बदलाव लाने, वैर-भाव छोड़ने और प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री भाव विकसित करने का अवसर है। प्रेम का विस्तार ही अहिंसा की सच्ची साधना है और यही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
आकर्षक आंगी से सजा परमात्मा का दरबार
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया व महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन परमात्मा की नयनाभिराम आंगी सजाई गई। विजक्षण बहु मंडल द्वारा सजाई गई आकर्षक एवं मनोहारी आंगी के विशेष दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। पर्वाधिराज के आठों दिन परमात्मा की भव्य आंगी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगी। महापर्व में प्रतिदिन धार्मिक प्रवचन,पूजा, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप-साधना और स्वाध्याय सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। 15 सितंबर को सवत्सरी महापर्व (क्षमायाचना) के साथ पर्युषण महापर्व का समापन होगा। पर्वाधिराज के प्रथम दिन धर्मसभा में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने मुनिश्री के प्रवचन का श्रवण कर अहिंसा,संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।




