स्वाइन फ्लू से मारे गए सुअर, नहीं मिल रहा मुआवजा: बसोर समाज के 200 लोग 11 दिन से धरना पर बैठे, बांस के बर्तन बनाकर लगा रहे फेरी

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रीवा24 मिनट पहले
रीवा के बसोर समाज के लोग दिल्ली के किसान आंदोलन की तर्ज पर कलेक्ट्रेट के सामने पिछले 10 दिनों से धरना दे रहे हैं। जिले में इस समाज के करीब 30 हजार परिवार सुअर पालन करते हैं। धरना दे रहे लोगों का कहना है कि पिछले माह अफ्रीकन स्वाइन फ्लू की चपेट में करीब 60 हजार से अधिक सुअरों की मौत हो चुकी है। जबकि प्रशासन ने जिन 271 सुअर को इंजेक्शन देकर मारा है, सिर्फ उन्हीं का मुआवजा दिया जा रहा है। समाज के लोग अफ्रीकन स्वाइन फ्लू से मारे गए सभी सूअरों का मुआवजा मांग रहे हैं। इसके आंदोलन को अब संयुक्त किसान मोर्चा रीवा संभाग इकाई ने भी समर्थन दे दिया है। किसान मोर्चा के संयोजक शिव सिंह कहते हैं कि जब तक बसोर समाज को उनके पशुओं का मुआवजा नहीं मिल जाता, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा। धरना पर बैठे लोगों को किसान मोर्चा बांस मुहैया करा रहा है और समाज के लोग धरना स्थल पर बैठकर बांस की टोकनी बना रहे है। अब धरना स्थल पर ही शादी, ब्याह, शोकसभा समेत सभी कार्यक्रम किए जाएंगे। बसोर समाज की रोजी-रोटी बांस के बर्तन और सुअर पालन से चलती है। लंबे समय से समाज के लोगों को योजना के तहत अब बांस नहीं मिल रहा है। वहीं सुअर पालन का व्यवसाय भी अफ्रीकन स्वाइन फ्लू के कारण बंद हो गया है। ऐसे में समाज के लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

कलेक्ट्रेट के सामने 11वें दिन धरना देते बसोर समाज के लोग। स्वाइन फ्लू की वजह से मारे गए सुअरों का मुआवजा देने की मांग जिला प्रशासन से कर रहे प्रदर्शनकारी।
10 हजार से अधिक परिवारों के पास रोजगार का संकट
सितंबर माह में फैले अफ्रीकन स्वाइन फीवर से 10 हजार से ज्यादा सुअर पालकों का रोगजार छीन गया है। प्रशासन ने वैक्सीनेशन कर सुअरों को मार दिया। हालांकि जिला प्रशासन ने मारे गए सुअरों के एवज में 100 से 150 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मुआवजा भी दिया है। लेकिन वायरस के कारण करीब 60 हजार सुअर मारे जा चुके हैं। इस बीमारी ने समाज के लोगों के सामने आर्थिक संकट की स्थिति पैदा कर दी है।
आश्वासन के बाद नहीं दिया जा रहा मुआवजा
बसोर समाज के अध्यक्ष प्रदीप कुमार बसोर ने बताया कि 10 दिन से हमारा आंदोलन जारी है। समाज के लोगों की मांग है कि बसोर व बंसल परिवार के जितने भी सुअर मारे गए हैं, उनका मुआवजा दिया जाए। जिला प्रशासन ने मुआवजे का आश्वासन दिया था, लेकिन अब पूरा नहीं किया जा रहा है। पूरा समाज रोजी रोटी को मोहताज है।

मुआवजे की मांग को लेकर कोई पहल नहीं होता देख अब धरनास्थल पर ही बांस की टोकनी बना रहे हैं, जिसे आसपास के मोहल्लों में फेरी लगाकर बेचतीं है महिलाएं।
इन क्षेत्रों के सुअर पालकों ने दिया धरना
रीवा शहर के 45 वार्डों में रहने वाले बंसल व बसोर समाज, गोविंदगढ़, मड़वा, गोरगांव, रायपुर कुर्चलियान, मनगवां, बैकुंठपुर, उमरी गांव सहित जिलेभर के सुअर पालक धरना पर बैठे हैं। सभी का कहना है कि तब तक हम लोग रीवा में ही डेरा डाले रहेंगे। यहीं परिवार सहित काम करेंगे। फिर दोपहर में फेरी लगाकर बांस के बर्तन बेचेंगे।

रीवा कलेक्ट्रेट के सामने धरनास्थल पर बांस की टोकनी बनाती बसोर समाज की महिला।
अफ्रीकन स्वाइन फ्लू का पहला केस अगस्त में सामने आया
रीवा में 8 अगस्त को वायरस ने दस्तक दी। सुअरों की लगातार हो रही मौत के बाद वार्ड क्रमांक-15 से 11 सूअरों के सैंपल 14 अगस्त को कलेक्ट किए गए। 15 अगस्त को सैंपल भोपाल भेजा गए, 16 अगस्त को पहुंचे। 17 और 18 अगस्त तक भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान में सैंपल जांचे गए। 19 अगस्त को जानलेवा अफ्रीकन स्वाइन फीवर नाम के वायरस की पुष्टि हुई।
271 सुअर इंजेक्शन देकर मारे, 270 का मिला मुआवजा
पशु चिकित्सा विभाग के उप संचालक डॉ. राजेश मिश्रा ने बताया कि किलिंग अभियान में कुल 271 मारे गए है। जिनमे 270 सुअर पालकों को मुआवजा बंट चुका है। जबकि एक सुअर पालक का खाता गलत होने के कारण राशि नहीं गई है। अब तक 16 लाख रुपए मुआवजा की राशि दी जा चुकी है।
गरीबों को छोड़ व्यापारियों को दिया जा रहा बांस
सुकरनिया बसोर ने बताया कि दो दशक पहले तक बसोर समाज का बही- खाता चलता था। जो राशन कार्ड की तरह होता था। शासन स्तर पर 10 बांस एक सप्ताह में एक परिवार को मिलता था। अब वन विभाग जंगल में बांस नहीं होने का हवाला देता है। जबकि पेपर मीलों और व्यापारियों को बांस की सप्लाई की जा रही है। ऐसे में हमको बांस ही नहीं मिलता है। कई बार भोपाल में जाकर शिकायत किए। कोई गौर ही नहीं किया है।

धरनास्थ पर बैठे बसोर समाज के लोग। प्रदर्शन में शामिल 200 लोगों का भोजन भी इसी जगह पर बनाया जा रहा है।
वायरस ने छींना सुअर, मरते वक्त नहीं मिल रही रोटी
धरना दे रही तेरसी बंसल ने कहा कि हमारे 7 सुअर मर चुके हैं। घर में कोई कमाने वाला नहीं है। पहले वायरस ने सुअर छीन लिया। 80 साल की उम्र में धरना देने आई हूं। प्रशासन गरीबों की नहीं सुन रहा। पहले बांस देना बंद कर दिया। अब घोषणा के बाद भी सुअरों का मुआवजा नहीं दिया जा रहा है।
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