Chhattisgarh

अबूझमाड़ नारायपुर का हाल, दशकों से ग्रामीण सड़क बनने का कर रहे इंतजार

नारायणपुर। जिला मुख्यालय से महज 23 किलोमीटर दूर पहाड़ों के बीच बसा गुमियाबेड़ा गांव आज भी विकास की उस सड़क का इंतजार कर रहा है, जो शायद उसके लिए किसी सपने से कम नहीं है। शहरों की चकाचौंध से महज कुछ किलोमीटर दूर यह गांव दशकों से बदहाली, दुर्गमता और सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। हैरानी की बात यह है कि गांव से नेशनल हाईवे-130डी की दूरी करीब चार किलोमीटर है, लेकिन सड़क के अभाव में यह दूरी ग्रामीणों के लिए आज भी कई गुना लंबी हो जाती है।

गुमियाबेड़ा के ग्रामीण पिछले करीब तीन दशकों से पहाड़ों को काटकर अपने आने-जाने के लिए खुद रास्ता तैयार करते आ रहे हैं। कभी नक्सलवाद के आतंक के चलते इस इलाके में सड़क, पुल-पुलिया और अन्य विकास कार्यों का विरोध किया जाता था। ऐसे हालात में ग्रामीणों ने जोखिम उठाकर अपने लिए रास्ते बनाए, लेकिन हर बारिश के साथ पहाड़ों से बहता पानी इन कच्चे रास्तों को बहा ले जाता है और ग्रामीणों को फिर से पहाड़ खोदकर रास्ता बनाने की जद्दोजहद करनी पड़ती है। विडंबना यह है कि समय बदला, इलाके में नक्सल गतिविधियां लगभग खत्म हुईं, लेकिन गुमियाबेड़ा की तस्वीर नहीं बदली। नक्सलवाद के दौर में विकास नहीं होने का हवाला दिया जाता था, मगर अब जब क्षेत्र नक्सल मुक्त होने की ओर बढ़ चुका है, तब भी ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

गांव तक पक्की सड़क नहीं होने का सबसे बड़ा खामियाजा ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों में उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक राशन लेने के लिए उन्हें करीब सात किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। राशन मिलने के बाद उसे कंधे पर लादकर वापस गांव तक लाना पड़ता है। बारिश के दिनों में यह सफर और भी खतरनाक हो जाता है, जब नदी-नाले उफान पर होते हैं और ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर उन्हें पार करना पड़ता है। गांव में सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है, जब कोई ग्रामीण बीमार पड़ता है या किसी महिला को प्रसव पीड़ा शुरू होती है। सड़क और वाहन की सुविधा नहीं होने के कारण मरीजों और गर्भवती महिलाओं को कांवड़ के सहारे पहाड़ों, नदी-नालों और दुर्गम रास्तों से पैदल स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाना पड़ता है।ऐसे सफर में सिर्फ मरीज की ही नहीं, बल्कि गर्भवती महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की जिंदगी भी खतरे में रहती है। जिस समय एक गर्भवती महिला को सुरक्षित और समय पर अस्पताल पहुंचना चाहिए, उस समय परिजन उसे कांवड़ में लेकर पहाड़ी रास्तों पर जिंदगी की जंग लड़ने को मजबूर हैं।

कई बार सरकारी दफ्तरों के लगा चुके चक्कर ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण की मांग को लेकर वे कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा चुके हैं। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी समस्या रखी गई, लेकिन वर्षों गुजरने के बाद भी सड़क की समस्या जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी जरूरत एंबुलेंस गांव तक पहुंच सके और वे बारिश में भी सुरक्षित तरीके से मुख्य सड़क तक आ-जा सकें।

आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं ग्रामीण गांव से महज चार किलोमीटर की दूरी पर नेशनल हाईवे-130डी मौजूद है, लेकिन गुमियाबेड़ा के ग्रामीणों के लिए यह सड़क आज भी दूर की चीज नजर आती है। सड़क के अभाव में प्रशासनिक पहुंच भी सीमित है और इसका सीधा असर राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं पर पड़ रहा है। पहाड़ों के बीच बसे इस गांव के ग्रामीण आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कभी तो उनके गांव तक भी विकास की सड़क पहुंचेगी। सवाल यही है कि आखिर तीन दशक से पहाड़ काटकर अपना रास्ता बनाने को मजबूर इन ग्रामीणों की आवाज कब प्रशासन तक पहुंचेगी।

मौसम खुलने के बाद रोड का काम शुरू होगा : सीईओ
इस मामले में जनपद पंचायत ओरछा के सीईओ अमित भाटिया ने कहा, वह एरिया अब तक नक्सलवाद से ग्रसित था, जहां पर परिस्थितियां विषम थी। कुछ समय से परिस्थितियां अनुकूल हुई है। जैसे ही मौसम खुलेगा तो हम बहुत सारे सड़के बनवाएंगे। स्वाभाविक है वह रोड भी बनेगा।

Related Articles

Back to top button