महाकाल ने भगवान विष्णु को सौंपी सत्ता: आधी रात को गोपाल मंदिर तक निकाली पालकी, एक-दूसरे को स्पर्श कर पहनाई माला

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उज्जैन18 मिनट पहले
आज यानि सोमवार से सृष्टि का भार भगवान विष्णु संभालेंगे। रविवार को कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी (वैकुंठ चतुर्दशी) के दिन भगवान महाकाल ने भगवान विष्णु को सृष्टि की सत्ता सौंप दी। उज्जैन में महाकाल की सवारी को धूमधाम के साथ गोपाल मंदिर तक ले जाया गया। यहां एक-दूसरे को बिल्वपत्र की माला स्पर्श करवाकर पहनाई गई।
मान्यता है कि भगवान शिव आज से सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंपकर कैलाश पर्वत पर तपस्या करने चले जाएंगे। इस दौरान दोनों ही देवों को उनकी प्रिय वस्तुओं का भोग भी लगाया गया। इससे पहले देवशयनी एकादशी के बाद से 4 महीने तक भगवान शिव सृष्टि संभाल रहे थे। आखिरी क्या है हरि-हर के बीच सत्ता हस्तांरण, कैसे होती है, क्या मान्यता… जानते हैं पूरी कहानी…
ऐसे होता है सत्ता हस्तांतरण
हर साल वैकुंठ चतुर्दशी पर महाकालेश्वर मंदिर से आधी रात को भगवान महाकाल की सवारी निकाली जाती है। यह सावन के सोमवार को निकाली जाने वाली सवारी में हरि-हर मिलन की तरह होता है। महाकाल मंदिर के आशीष पुजारी बताते हैं कि हरि हर के समीप विराजते हैं। यहां सत्ता एक-दूसरे को सौंपने के लिए दोनों का पूजन किया जाता है। उन्हें विशेष भोग लगाया जाता है। जहां भगवान श्री महाकालेश्वर व श्री द्वारकाधीश का पूजन किया जाता है।
दोनों ही भगवानों का दूध, दही, घी, शहद, शक्कर से पंचामृत अभिषेक पूजन किया जाता है। इसके बाद भगवान महाकाल का पूजन विष्णुजी की प्रिय तुलसी की माला से किया जाता है। वहीं, भगवान विष्णु को शिव की प्रिय बिल्वपत्र की माला अर्पित की जाती है। तुलसी की माला भगवान विष्णु को स्पर्श कराकर भगवन शिव को धारण कराई जाती है। इसी तरह भगवान शिव को बिल्वपत्र की माला स्पर्श कर भगवान विष्णु को माला पहनाई जाती है।
इस तरह दोनों की प्रिय मालाओं को एक-दूसरे को पहनाकर सृष्टि की सत्ता का हस्तांतरण होता है। दो देवताओं के इस दुर्लभ मिलन को देखने भक्त सालभर प्रतीक्षा करते हैं। यह अनूठी परंपरा वैष्णव व शैव मार्ग के समन्वय व सौहार्द का प्रतीक है।
क्या है मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के यहां विश्राम करने जाते हैं। उस समय संपूर्ण सृष्टि की सत्ता का भार भगवान शिव के पास होता है। हिंदू धर्म में बैकुंठ चतुर्दशी के संबंध में मान्यता है कि संसार के समस्त मांगलिक कार्य भगवान विष्णु के सानिध्य में होते हैं, लेकिन चार महीने विष्णुजी के शयनकाल में सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। जब देव उठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं, तो उसके बाद चतुर्दशी के दिन भगवान शिव उन्हें पुन: कार्यभार सौंपते हैं, इसीलिए यह दिन उत्सवी माहौल में मनाया जाता है। दो देवों के अद्भुत मिलन का नजारा साल में केवल एक ही बार देखने को मिलता है।
पुराणों में भी उल्लेख
महाकाल मंदिर के पुजारी आशीष शर्मा ने बताया कि वैकुंठ चतुर्दशी के दिन हर-हरि को सत्ता का भार सौंपकर कैलाश पर्वत तपस्या के लिए लौट जाते हैं। इस परंपरा को हरि-हर मिलन भी कहते हैं। स्कंद, पद्म और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के मुताबिक कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान शिव और विष्णुजी का मिलन करवाया जाता है। रात में दोनों देवताओं की महापूजा की जाती है। भगवान शिव सृष्टि चलाने की जिम्मेदारी फिर से विष्णुजी को सौंपते हैं। भगवान विष्णुजी का निवास बैकुंठ लोक में होता है, इसलिए इसे बैकुंठ चतुर्दशी भी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में अवतार लिया था।
रात करीब 11 बजे के बाद भगवान महाकाल की सवारी गोपाल मंदिर के लिए निकाली गई। इस दौरान सवारी महाकाल चौराहा, गुदरी बाजार, पटनी बाजार होते हुए गोपाल मंदिर पहुंची। आधी रात को भी महाकाल के दर्शनों के लिए भक्तों की भारी भीड़ रही। सवारी में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। सवारी में जमकर आतिशबाजी भी की गई।
ये भी है कथा
मान्यताओं के अनुसार एक बार नारद जी भगवान श्री हरि विष्णुजी से सरल भक्ति कर मुक्ति पाने का मार्ग पूछते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर-नारी व्रत का पालन करते हैं। श्रद्धा-भक्ति से मेरी पूजा करते हैं, उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं। अत: भगवान श्री हरि कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्ग के द्वार खुला रखने का आदेश देते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि इस दिन जो भी भक्त मेरा पूजन करता है, वह वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।
आतिशबाजी और हिंगोट चलाने पर प्रतिबंध
सवारी के दौरान श्रद्धालु भगवान महाकाल का स्वागत आतिशबाजी से करते हैं। इससे कई बार लोग घायल भी हुए हैं। इसे देखते हुए एडीएम संतोष टैगोर ने आतिशबाजी और हिंगोट चलाने पर दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 144 (1) के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिए थे। इसके बाद भी कई श्रद्धालुओं ने सवारी का स्वागत आतिशबाजी से किया।
पूजन और व्रत विधि
महाकाल मंदिर के महेश पुजारी के अनुसार इस दिन शिवजी और विष्णुजी की विशेष पूजा करनी चाहिए। भगवान विष्णु को केसर, चंदन मिले जल से स्नान कराएं। चंदन, पीले वस्त्र, पीले फूल चढ़ाएं। शिवलिंग को दूध मिले जल से स्नान के बाद सफेद आंकड़े के फूल, अक्षत, बिल्वपत्र अर्पित करें। दोनों भगवान को कमल फूल भी अर्पित करें। दोनों देवतओं को दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं। दीप-धूप जलाएं। आरती करें। मंत्रों जाप करें। रात में कमल के फूलों से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
पूजा के मंत्र
ऊं शिवकेशवाय नम:
ऊं हरिहर नमाम्यहं
विष्णु मंत्र
पद्मनाभोरविन्दाक्ष: पद्मगर्भ: शरीरभूत्। महर्द्धिऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वज:।। अतुल: शरभो भीम: समयज्ञो हविर्हरि:। सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जय:।
शिव मंत्र
वन्दे महेशं सुरसिद्धसेवितं भक्तै: सदा पूजितपादपद्ममम्।ब्रह्मेन्द्रविष्णुप्रमुखैश्च वन्दितं ध्यायेत्सदा कामदुधं प्रसन्नम्।।
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