बिजली परियोजनाओं के नाम रिकार्ड जिंदगियों के हिस्से में सिर्फ राखड़

कोरबा, 31 मार्च। गर्मी का मौसम शुरू क्या हुआ, राखड़ कोरबा नगर और आसपास के बड़े हिस्से की जिंदगियों के लिए सिरदर्द बन गई है। यह सिलसिला कई दशक से शुरू हुआ और अब तक बदस्तूर जारी है। समस्या के नियंत्रण के दावे हवा में तैर रहे हैं और जिंदगियां पूछ रही हैं कि आखिर इनका सच सामने कब आएगा। एनटीपीसी की 2600 मेगावाट, सीएसईबी कोरबा ईस्ट और वेस्ट की 1840, बालको की 1200, अडाणी पावर की विस्तारित क्षमता के साथ 1200 मेगावाट बिजली परियोजना के अलावा कई और निजी परियोजनाएं जिले में काम कर रही हैं। इनकी स्थापना से लेकर उत्पादन की जिम्मेदारी अपनी है और रिकार्ड भी अपने। समय के साथ उपलब्धियों के पन्ने बढ़ते जा रहे हैं।
कहना गलत नहीं होगा कि जितना उत्पादन उतनी उपलब्धियां और इसी के हिसाब से परियोजनाओं का भविष्य। इन सबसे हटकर बड़ी समस्या जिले की समस्या यह है कि इन परियोजनाओं में रोजाना खपत होने वाली कोयला की एक बड़ी मात्रा राख के रूप में निकल रही है। राख के शत्-प्रतिशत निस्तारण और इसके कारण कहीं भी न होने वाली समस्या के दावे केवल बोलने के लिए अच्छे हैं। सच्चाई यह है कि कोरबा शहरी से लेकर बड़े ग्रामीण हिस्से की जिंदगी राखड़ के चक्कर में बदहाल होती जा रही है।
एनजीटी से लेकर प्रशासन के फरमान और जुर्माने का असर क्या होता है, कंपनियों को इससे मतलब नहीं है। अब असली सवाल यही है कि क्या जिले की जिंदगियों के हिस्से में राखड़ ही रहेगी या कुछ और।




