घटनास्थल पर साक्ष्यों को सुरक्षित रखना मुश्किल: वैज्ञानिक तथ्यों में पुलिस कमजोर, जिले में 4 माह से फॉरेंसिक एक्सपर्ट नहीं

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खंडवाएक घंटा पहले
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जसवाड़ी रोड स्थित खेत में मासूम के साथ दरिंदगी के निशान ढूंढने तीसरे दिन पहुंची फॉरेंसिक टीम
वैज्ञानिक तथ्यों को जुटाने में पुलिस कमजोर पड़ रही है। इसकी वजह यह है कि, चार माह से फॉरेंसिक विभाग में वैज्ञानिक अधिकारी का पद खाली है। निमाड़ के चारों जिलों में सिर्फ एक ही वैज्ञानिक अधिकारी है। ऐसे में गंभीर वारदात के बाद पुलिस को साक्ष्य जुटाने के लिए खरगोन से वैज्ञानिक अधिकारी को बुलवाना पड़ता है। जिले में वैज्ञानिक अधिकारी न होने से घटनास्थल पर तत्काल साक्ष्य नहीं जुटा पा रहे हैं।
पुलिस अफसरों का कहना है कि वैज्ञानिक अधिकारी आने तक वारदात के बाद साक्ष्य सुरक्षित रखने घटनास्थल सील कर देते हैं। वहीं, फॉरेंसिक विभाग के सूत्रों का कहना है घटनाक्रम के बाद तत्काल साक्ष्य जुटाने से रिपोर्ट में ज्यादा बेहतर रिजल्ट मिलते हैं। बजाए देर से जुटाए गए साक्ष्यों के।
खंडवा में फॉरेंसिक विभाग के वैज्ञानिक अधिकारी विकास मुजाल्दा का ट्रांसफर हुए चार माह बीत चुके हैं। उनकी रैंक का अभी तक कोई अधिकारी नहीं आया है। ऐसी स्थिति में फॉरेंसिक विभाग में अधीनस्थ कर्मचारी घटनास्थल से साक्ष्य संकलित कर रहे हैं। हालांकि, ये सिर्फ छोटी घटनाओं के सैंपल ही ले पाते है। जब कोई गंभीर अपराध हो जाता है तो पुलिस खरगोन के वैज्ञानिक अधिकारी सुनील मकवाना का मुंह ताकती है। मकवाना के कंधों पर खरगोन के ही नहीं, पूरे निमाड़ रेंज का भार है।
खंडवा, बुरहानपुर और बड़वानी में जब भी गंभीर अपराध होता है तो मकवाना वहां पहुंचकर साक्ष्यों को जुटाते हैं। इसके लिए कई बार उन्हें एक दिन का समय लग जाता है। मकवाना एक महीने में तीसरी बार खंडवा में जांच करने पहुंचे। इधर, ऐसी स्थिति में घटनास्थल को सील कर साक्ष्यों को प्रिजर्व करना कठिन हो जाता है। पुलिस भले ही ताला लगवाकर जेब में चाबी रख लेती है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ताले की दूसरी चाबी भी परिजन के पास रहती है। साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ होने का अंदेशा रहता है।
अधीनस्थों की मजबूरी, एक्सपर्ट की राय लिए बिना पूरा नहीं होता काम-
खंडवा, बुरहानपुर व बड़वानी तीनों जिलों में भी फॉरेंसिक विभाग में टीम मौजूद है लेकिन अधिकारी नहीं होने की वजह से सभी पर अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है। अधीनस्थों का कहना है कि एक्सपर्ट की राय लिए बिना दस्तावेज संबंधी काम पूरे नहीं होते। ऐसी स्थिति में मकवाना ही उनकी रिपोर्ट को फाइनल करते हैं। अतिरिक्त काम होने की वजह से कई बार समय पर काम में देरी भी हो जाती है।
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