फौजी से डकैत, फिर गांधीवादी बनने की कहानी…: जमीन दबाई तो चचेरे भाई को 28 गोलियां मारीं; दूसरे ने 40 हत्या की

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भोपाल\मुरैना6 घंटे पहलेलेखक: संतोष सिंह
कुख्यात गुड्डा गुर्जर की शॉर्ट एनकाउंटर में गिरफ्तारी के बाद से डकैत फिर चर्चा में हैं। आज हम आपको पानसिंह तोमर जैसी एक कहानी बताएंगे। फौज से छुटि्टयों पर आए युवक ने अपनी जमीन के लिए हथियार उठाया था। 23 साल के इस डकैत ने अपने चचेरे भाई को 28 गोलियां मारी थीं। चंबल के बीहड़ों से आज पढ़िए 2 डाकुओं की कहानी।


【 कहानी_1 】
मैं फौज से 2 महीने की छुट्टी लेकर गांव आया था…
बहादुर सिंह कुशवाहा ने फौजी से डाकू बनने की पूरी कहानी दैनिक भास्कर से बयां की। बहादुर कहते हैं, मेरे दादा कमल सिंह का बड़ा नाम था। उनके नाम पर ही मेरे गांव का नाम कमला का पुरा पड़ा था। वे 150 बीघा जमीन के मालिक थे। मेरे पिता छेंहू सिंह 6 भाइयों में तीसरे नंबर के थे। मेरे मां-बाप बचपन में ही गुजर गए थे। बड़े भाई भगवान लाल सिंह और मैंने अपने आप को संभाला और जीवन में आगे बढ़े। मैं 5वीं तक पढ़ा था। 17 साल का हुआ तो कच्चे में फौज की नौकरी लग गई। 18 साल होने पर नौकरी पक्की हुई। फिर एक साल की पीटी और ट्रेनिंग शुरू हुई। इस दौरान मैं घर नहीं गया था। फौज में न जाने कब छुट्टी मिले तो सूबेदार से जिद करके 2 महीने की छुट्टी ली, ताकि अपने गांव का आनंद ले सकूं।

बहादुर सिंह गांधीवादी बनने के बाद लोगों को जागरूक करते रहते हैं। विभिन्न प्रकार के सत्याग्रहों में भाग लेते हैं। ऐसे ही एक सत्याग्रह के दौरान की ये तस्वीर 10 साल पुरानी है।
उसे सबक सिखाने के लिए 19 की उम्र में डाकू बना
गांव लौटा तो बड़े भाई भगवान लाल ने बताया कि चचेरे भाई पत्तू ने हमारे हिस्से की 10 बीघा जमीन हड़प ली है। उसे वापस लेने के लिए कई बार हमारा विवाद हुआ। हमें लगा आज नहीं तो कल चचेरा भाई मान ही जाएगा। एक बार मारपीट तक की नौबत आ गई। थाने में रिपोर्ट हो गई। थानेदार चचेरे भाई के प्रभाव में था, उसने हमारी एक न सुनी। इसके बाद हम समाज की पंचायत में गए वहां भी कोई हमारे पक्ष में खड़ा नहीं हुआ। सबके सब चचेरे भाई की दबंगई से डरते थे। मेरी उम्र नई थी तो जोश भी था। चचेरे भाई की दबंगई सहन नहीं हुई। उसे सबक सिखाने की ठानकर घर से निकल गया।
मैं 3 साल तक इधर-उधर भटकता रहा। आखिर में 22 की उम्र 1962 में चंबल के बीहड़ में गया। वहां मेरी मुलाकात डाकू माधव सिंह और उनकी गैंग से हुई। माधव सिंह चंबल के बड़े डकैत थे, तब मेरे सहित उनकी 9 की गैंग थी। माधव सिंह बोले कि परेशान न हो, तुम्हारा समझौता करा देते हैं। तुम गांव लौट जाना, लेकिन मैं तो पत्तू को सबक सिखाने की ठान चुका था। मुकदमा दर्ज होने के कारण मेरी फौज की नौकरी चली गई। गांव लौटकर भी क्या करता, इसलिए बीहड़ में ही रह गया।

बहादुर सिंह 22 साल की उम्र 1962 में चंबल के बीहड़ में पहुंचे। उन पर एफआईआर दर्ज हो चुकी थी, इसलिए फौज की नौकरी चली गई थी। इसके बाद उन्होंने डाकू बनने के 3 साल बाद अपने चचेरे भाई की हत्या कर बदला लिया। बाकी कहानी नीचे पढ़िए…
उसके सीने में उतार दी 28 गोलियां
1965 में मेरा बदला पूरा हुआ। उस रात मैं अपने गांव लौटा और चचेरे भाई पत्तू को खोज निकाला। वह 2 गोलियों में ही गिर पड़ा, लेकिन मुझ पर इतना गुस्सा सवार था कि मैंने उसे एक के बाद एक 28 गोलियां मारीं। वो रेडियो और अखबार का दौर था। हर बात कुछ सप्ताह बाद तक फैलती थी। खबर आई तो मैं भी इस कांड के बाद काफी फेमस हो गया था। इस अपराध के बाद मैं डाकू माधव सिंह के हर अपराध में भागीदार बना। हमारी अक्सर पुलिस से मुठभेड़ होती थी। माधव सिंह और हरविलास की अगुवाई वाली हमारी गैंग देखते ही देखते 110 की हो गई थी।

बहादुर सिंह ने बताया कि इलाके के धनी आदमी जो गरीबों का खून चूसते थे। उन्हें धमकी भरी चिट्ठी भेजकर वसूली किया करते थे। जो पैसा नहीं देते उन्हें अगवाकर लिया जाता था।
कई बार पकड़ 8-8 महीने तक हमारे साथ रहती थी
बीहड़ में रहने वाले हम डाकुओं का असल काम धनी लोगों से पैसा वसूलना था। अधिक पैसे वालों को चिट्ठी भेजकर पैसे मांगते थे। पैसा नहीं देने वालों को उठा लाते थे। उठाकर लाने के बाद हम उनसे पहले मांगी गई फिरौती से डबल पैसा वसूलते थे, लेकिन किसी अपहृत (जिसे पकड़कर लाए) को कभी परेशान नहीं करते थे। हम उसे अच्छे से रखते थे। कई बार फिरौती वसूलने में छह से आठ महीने का लंबा वक्त भी गुजर जाता था। तब फिरौती की रकम मिल पाती थी। तब तक उसे अपनी गैंग के साथ ही रखते थे। वो भी हमारे काम में हाथ बंटाता था।

गर्दन में लगी गोली का निशान दिखाते हुए बहादुर सिंह कहते हैं कि कई बार पुलिस से बीहड़ में मुठभेड़ हुई। हमारा तो घर ही चंबल का बीहड़ था तो हमें सारे रास्ते पता था, लेकिन पुलिस कुछ नहीं जानती थी। इस कारण वे मारे जाते थे। इससे आगे की कहानी नीचे है…
मेरी गर्दन में गोली लगी, आज भी निशान है
बीहड़ में अकसर पुलिसवालों से हमारी गैंग की मुठभेड़ होती थी। चंबल के बीहड़ को हमसे ज्यादा पुलिस वाले नहीं जानते थे। यही कारण होता कि हमारी गैंग के सदस्य मुठभेड़ में जब घायल होते थे, तो पुलिस 15 से 20 लोग मरते थे। घायल होने पर हम जंगल में डॉक्टर को बुला लेते थे। जंगल में ही हल्के ऑपरेशन तक होते थे। मेरी गर्दन में गोली लगी थी। अब भी उसका निशान है।

बहादुर अपने नए जीवन को गांधीवादी सुब्बाराव की देन मानते हैं। वे भगवान की तस्वीर के साथ सुब्बाराव की तस्वीर रखते हैं। बहादुर कहते हैं कि उन दिनों में हम अपनी गैंग को बटालियन और अपने लीडर को मुखिया बोला करते थे। मेरे ऊपर पुलिस ने 20 हजार का इनाम घोषित किया था।
जितना पुराना डकैत, उसकी उतनी इज्जत
हम गैंग के मुखिया को लीडर और गिरोह को बटालियन कहते थे। उस समय एमपी, यूपी और राजस्थान की पुलिस ने हम पर 3 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था। मुझ पर भी 20 हजार रुपए का इनाम था। गिरोह के दूसरे सदस्यों पर भी 5 हजार से 10 हजार रुपए का इनाम था। पुलिस की गिरफ्त से कैसे बचे? इस सवाल पर बोले कि हमारी गैंग की रणनीति ही ऐसी थी। उस समय गिरोह के लोग जंगल और बीहड़ में ही रहते थे। जहां खाना बनाते थे, वहां आराम नहीं करते थे। कोई मिलने आता था, तो उस जगह को तुरंत चेंज कर देते थे। गिरोह में जो जितना पुराना डकैत होता था, उसकी इज्जत उतनी ही अधिक होती थी। महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी उसी को दी जाती थी।

गांधीवादी सुब्बाराव की पहल पर किया आत्मसमर्पण
बहादुर सिंह कुशवाहा आगे बताते हैं कि आजादी मिलने के बाद गांधीवादी डॉ. एसएन सुब्बाराव चंबल आए। यहां का पिछड़ापन देखकर वे बहुत दु:खी हुए। उन्होंने कई डकैतों का आत्मसमर्पण करवाया। हम उन्हें भाईजी कहकर संबोधित करते थे। उस समय चंबल में मेरे गिरोह के अलावा कल्ला, पुतली बाई, मोहर सिंह, हरविलास, सरजू सिंह, मलखान सिंह और शोभरन सिंह सहित कई गिरोह सक्रिय थे। कभी पुलिस से मुठभेड़ तो कभी आपस में गैंगवार होता रहता था।
चंबल में डाकुओं की समस्या देख भाईजी ने पहल की। भाईजी एक मध्यस्थ के माध्यम से गैंग लीडर माधव सिंह से मिले। भाईजी बोले कि तुम लोगों का रास्ता गलत है। अच्छा रास्ता चुनना चाहो तो मैं सरकार से बात करूंगा। बांग्लादेश की आजादी के समय वहां भी डकैतों का आतंक था। तब विनोवा भावे ने समर्पण कराया था। सभी बाद में छूट गए। उनका हवाला देकर हमें सहमत कराया गया। इसके बाद हम लोगों को भी समझ आया और हम आत्मसमर्पण को तैयार हो गए।

कोर्ट ने 80 साल की सजा सुनाई, 5 साल में छूट गया
समर्पण के बाद कोर्ट ने मुझे 80 साल की सजा सुनाई। हालांकि, जेल में 5 साल ही रहना पड़ा। शेष सजा माफ कर दी गई। जेल में रहने के दौरान ही रिश्तेदारों ने मेरी शादी तय कर दी। एक महीने की पैरोल लेकर शादी करने गया था। मेरी जीवन संगनी सिंगारदेह गांव की जामता बाई बनी। उसे भी पता था कि मेरा अतीत चंबल है, लेकिन उसने मेरे वर्तमान को देखकर शादी करना तय किया था। एक महीने ही हम साथ रह पाए। इसके बाद मैं जेल चला गया।
1977 में जेल से रिहा हुआ, तब परिवार बढ़ाया। मेरे 3 बेटे, 2 बेटियां, बहूएं और 6 नाती, 7 नातिनों का कुल 21 लोगों का भरा-पूरा परिवार है। तीनों बेटे पुणे में काम करते हैं। जिस 10 बीघा जमीन के चलते मैं डकैत बना था, उसे 20 हजार में बेच दिया था। 10 हजार में 2 किमी दूर रिझौनी में 10 बीघा जमीन खरीदी और 10 हजार रुपए से घर बनवा लिया था। अब मेरा परिवार रिझौनी में ही रहता है। पर मेरा जीवन जौरा गांधी आश्रम के एक कमरे में गुजर रहा है।

आज के डकैत तो बहन-बेटियों के कपड़े तक उतार लेते हैं
बहादुर सिंह कुशवाहा ने कहते हैं कि अभी जो डकैत बन रहे हैं, उसमें और हमारे समय के डकैत में बहुत फर्क है। हमारे समय के डकैत किसी गरीब को परेशान नहीं करते थे। बहन-बेटी को नहीं छेड़ते थे। जेवर नहीं उतरवाते थे। अब के डकैत तो बहन-बेटी के कपड़े तक उतार लेते हैं। अभी के डकैत रात में आराम से घरों में रहते हैं। दिन में बीहड़ में उतर जाते हैं। गुड्डा अभी बड़ा नाम था। पुलिसवाले बोल रहे हैं कि मुठभेड़ में पैर में गोली मारी है। अच्छे बागी को पुलिस कभी जिंदा नहीं पकड़ सकती। राशन-पानी रहेगा तो 20 कदम आगे भी नहीं आ पाएंगे।

गांधीवादी सुब्बाराव के साथ पुन्ना मुखिया। गिरोह का लीडर होने के कारण उन्हें मुखिया नाम मिला था। तब से आज तक लोग उन्हें इसी नाम से जानते हैं। हालांकि उनका असली नाम पुन्ना रजक है।
पुन्ना ने 25 की उम्र में थामी थी बंदूक, 40 लोगों को मारा था
हमने पुन्ना मुखिया से बातचीत का सिलसिला शुरू किया। उन्होंने बताया कि डकैत बनने के पहले ही शादी हो गई थी। मेरा मूल गांव गांगोली नंद था। 5 भाइयों में 25 बीघा खेत था। गांव के दबंग खूबचंद कलार, शिवहरे कलार और उनके परिवार ने हमारी जमीन पर कब्जा कर रखा था। इसे लेकर हमारे परिवार के बीच मारपीट होती रहती थी। इसी से परेशान होकर 25 की उम्र में मैं चंबल के बीहड़ में उतर गया। मैंने खुद की गैंग बनाई थी। मुखिया सरनेम हमारे गिरोह के साथियों ने दिया। आत्मसमर्पण के समय तक मेरी गैंग में 50 लोग जुड़ चुके थे।
खूबचंद को नहीं मार सका, आज भी अफसोस
खूबचंद को छोड़कर उसके भाई, काका, चाचा सहित 40 लोगों की हत्या की थी। खूबचंद को नहीं मार पाने का अफसोस आज भी है। एमपी सहित यूपी और राजस्थान में मेरी गैंग का खौफ था। 10-15 दिनों में हमारी पुलिस से मुठभेड़ हो जाती थी। जांघ पर निशान दिखाते हुए कहा कि मुझे भी गोली लगी थी। बीहड़ में अपहरण और चिट्ठी भेजकर वसूली करना ही धंधा था। लोक नायक जयप्रकाश की मौजूदगी में 1972 में आत्मसमर्पण किया था। तब सरकार की ओर से 10 बीघा सिंचित और 30 बीघा असिंचित जमीन मिली थी। 10 हजार रुपए बैल, भैंस आदि खरीदने के लिए मिला था। 5 साल जेल में रहना पड़ा। आखिरी के 3 साल खुली जेल में गुजरा था।
अब बीमार है 90 साल के पुन्ना मुखिया
जौरा से 45 किमी दूर कोटसिरथरा गांव है। वर्तमान में भी ये डकैत प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। गांव में ठाकुर, ब्राह्मण, धाकड़, कुम्हार और साहू जातियों के 300 घर हैं। 1972 में आत्मसमर्पण करने वाले डकैत पुन्ना मुखिया 90 साल के हो चुके हैं। पुन्ना कहते हैं, जेल से छूटने के बाद मैं कोटसिरथरा में आकर बस गया। हम इस गांव के आखिरी छोर पर रह रहे पुन्ना मुखिया के घर पहुंचे, तो शाम हो चुकी थी। पुन्ना रजक बीमार हैं और खाट पर लेटे हुए थे। बगल के खाट पर उनकी पत्नी रामदेही लेटी थीं। 80 वर्षीय रामदेही ने एक दिन पहले ही मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराकर लौटी हैं। परिवार में 8 बेटे, तीन बेटियां, नाती-पोतों सहित 25 लोग हैं। 6 बेटों की शादी हो चुकी है। एक बेटा दिल्ली में नौकरी करता है। अन्य 7 बेटे घर पर ही रहकर मजदूरी करते हैं। तीनों बेटियों की शादी हो चुकी है।
ग्राफिक्स: जितेंद्र ठाकुर
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गुड्डा के रिश्तेदार भी कम नहीं, 6000 फीट पाइपलाइन उखाड़ी; 60 परिवार संकट में

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