CG हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: विदेश से MBBS करने वाले डॉक्टरों को नहीं लौटेगी एक लाख रुपये की इंटर्नशिप फीस, पुराने स्टाइपेंड का दावा भी खारिज

बिलासपुर, 01 नवम्बर 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई कर बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में इंटर्नशिप करने वाले विदेशी मेडिकल स्नातकों को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने इंटर्नशिप के दौरान जमा कराई गई एक लाख रुपये की फीस वापस करने और भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के समान स्टाइपेंड देने की मांग को खारिज कर दिया है। इस संबंध में दाखिल तीन अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें निरस्त कर दिया।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने 18 नवंबर 2021 से पहले विदेश से अपनी मेडिकल डिग्री प्राप्त की थी। ऐसे में वे राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) के वर्ष 2021 में लागू किए गए विदेशी चिकित्सा स्नातक लाइसेंसिएट संबंधी नियमों के आधार पर फीस वापसी और पूर्व अवधि के स्टाइपेंड का दावा नहीं कर सकते।
इस मामले में मुख्य याचिका डॉ. श्यामू कुमार जांगड़े और 13 अन्य डॉक्टरों की ओर से दायर की गई थी। इसके अलावा डॉ. छत्रेश चौधरी और डॉ. प्रणव पांडेय ने भी अलग-अलग याचिकाएं प्रस्तुत की थीं। तीनों मामलों में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विकास श्रीवास्तव ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से पैनल अधिवक्ता आकांक्षा वर्मा ने पैरवी की।
याचिकाकर्ता डॉक्टरों का कहना था कि उन्होंने विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिम्स बिलासपुर में अनिवार्य इंटर्नशिप के लिए प्रवेश लिया था। इस दौरान संस्थान की ओर से प्रत्येक डॉक्टर से एक लाख रुपये फीस जमा कराई गई थी। बाद में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने 4 मार्च 2022 को दिशा-निर्देश और 19 मई 2022 को परिपत्र जारी किया। इसमें 18 नवंबर 2021 से पहले विदेश से मेडिकल डिग्री हासिल करने वाले छात्रों को इंटर्नशिप के लिए फीस से छूट देने और भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के समान स्टाइपेंड व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान बताया गया था।
डॉक्टरों ने इन निर्देशों का हवाला देते हुए जमा की गई एक लाख रुपये की फीस वापस करने और इंटर्नशिप में पंजीयन की तारीख से स्टाइपेंड का भुगतान करने की मांग की थी। उनका कहना था कि उन्हें अगस्त 2022 से स्टाइपेंड मिलना शुरू हुआ, लेकिन इससे पहले की इंटर्नशिप अवधि का भुगतान नहीं किया गया। इसी आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि संबंधित डॉक्टरों ने वर्ष 2015 में ही इंटर्नशिप फीस जमा कर दी थी। इसके बाद 24 नवंबर 2022 को आयोजित बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि 4 मार्च 2022 के एनएमसी परिपत्र जारी होने से पहले जिन विद्यार्थियों से इंटर्नशिप फीस ली जा चुकी है, उनकी फीस वापस नहीं की जाएगी। सरकार ने तर्क दिया कि बाद में जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर पहले से जमा कराई गई फीस की वापसी का दावा उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने मामले के दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद राज्य सरकार के फैसले को रिकॉर्ड पर मौजूद माना। कोर्ट ने कहा कि सभी याचिकाकर्ताओं ने 18 नवंबर 2021 से पहले विदेशी मेडिकल डिग्री हासिल की थी। इसलिए वे 2021 के नए नियमों के आधार पर अपनी मांगों को स्वीकार कराने के हकदार नहीं हैं।
स्टाइपेंड के संबंध में भी कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई अन्य लागू नियम, प्रावधान या विशेष निर्देश प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके आधार पर अगस्त 2022 से पहले की अवधि का स्टाइपेंड देने का आदेश जारी किया जा सके।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सिम्स बिलासपुर में इंटर्नशिप कर चुके संबंधित विदेशी मेडिकल स्नातकों को जमा की गई एक लाख रुपये की फीस वापस नहीं मिलेगी। साथ ही अगस्त 2022 से पहले की अवधि के स्टाइपेंड का भुगतान कराने की उनकी मांग भी पूरी नहीं हो सकेगी। कोर्ट ने तीनों याचिकाओं को खारिज करते हुए इस मामले का निराकरण कर दिया।




