Chhattisgarh

औद्योगिक चमक के बीच सिमटती विरासत: सीतामढ़ी के बसोर मोहल्ले में संघर्ष करता बांस शिल्प

कोरबा,22 फरवरी 2026। देश के कई राज्यों को ऊर्जा आपूर्ति करने वाला औद्योगिक शहर कोरबा अपनी फैक्ट्रियों और पावर प्लांट्स के लिए पहचाना जाता है, लेकिन इसी औद्योगिक चकाचौंध के पीछे एक ऐसी परंपरा भी जीवित है, जो अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। शहर के सीतामढ़ी क्षेत्र के पास स्थित बसोर मोहल्ला आज भी बांस शिल्प की उस विरासत को सहेजे हुए है, जिसे पीढ़ियों से यहां के कारीगर आगे बढ़ाते आए हैं।

सड़क किनारे छोटे-छोटे समूहों में बैठे बुजुर्ग कारीगर बांस की छाल को बारीकी से उतारते हुए सूप, टोकरी, पर्रा और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएँ तैयार करते नजर आते हैं। उनके हाथों की कारीगरी आज भी उतनी ही निपुण है, लेकिन बाजार की बदलती परिस्थितियों ने इस पारंपरिक शिल्प को कठिन मोड़ पर ला खड़ा किया है।

बांस शिल्प से जुड़े कारीगर भैया लाल बताते हैं कि यह उनका पारंपरिक, जातिगत पेशा है, लेकिन अब बांस की कीमत लगातार बढ़ रही है। “दिन भर की मेहनत में मुश्किल से दो-तीन सूप बन पाते हैं, जिनसे करीब 200 रुपये की आमदनी होती है। इतनी कमाई में परिवार चलाना कठिन है,” वे कहते हैं। उनका मानना है कि नई पीढ़ी इस पेशे में रुचि नहीं ले रही, क्योंकि इसमें मेहनत अधिक और आमदनी कम है।

इसी तरह गोलन बसोर का कहना है कि वे एक झोपड़ी के नीचे बैठकर बांस के उत्पाद तैयार करते हैं। “हम बुजुर्ग हो गए हैं, बच्चे मजदूरी के लिए बाहर चले जाते हैं। यहां बांस का काम करके दो-पांच पैसे ही मिलते हैं। आने वाले समय में शायद बांस के सूप और टोकरी कम ही दिखाई दें,” वे चिंता जताते हैं।

बसोर समुदाय के कारीगरों के अनुसार, पारंपरिक शिल्प के संरक्षण में दो बड़ी चुनौतियाँ हैं—घटती बाजार मांग और आर्थिक व्यवहारिकता का अभाव। आधुनिक जीवनशैली में प्लास्टिक और सिंथेटिक उत्पादों के बढ़ते उपयोग ने बांस से बने सामान की मांग को काफी हद तक प्रभावित किया है।

हालांकि, शासन स्तर पर बांस शिल्प के पुनरुत्थान के प्रयास भी किए जा रहे हैं। कारीगरों को आधुनिक उपकरण, गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल और बाजार से जोड़ने के लिए बांस प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किए गए हैं। साथ ही कौशल उन्नयन प्रशिक्षण और डिजाइन-आधारित कार्यशालाओं के माध्यम से कारीगरों को आधुनिक डिज़ाइन और टिकाऊ तकनीकों की जानकारी दी जा रही है।

फिर भी, सवाल यही है कि क्या ये प्रयास समय रहते इस पारंपरिक शिल्प को नई पहचान और स्थायित्व दिला पाएंगे, या औद्योगिक विकास की दौड़ में यह सांस्कृतिक विरासत धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बन जाएगी।

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