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जगतगुरु स्वामी रामानंदाचार्य महाराज की जयंती पर विशेष

जगद्गुरु स्वामी रामानंदाचार्य महाराज का जन्म संवत 1356 (1299 ईस्वी) में प्रयागराज के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनकी शिक्षा प्रयागराज एवं वाराणसी में पूर्ण हुई। उनके गुरु अनंत श्री विभूषित स्वामी हरियानंद महाराज के शिष्य राघवानंद महाराज थे,जो श्री संप्रदाय से संबंधित थे। इस संदर्भ में लिखा है कि – हरियानन्दस्य शिष्यो हि राघवानन्ददेशिक: । यस्य वै शिष्यतां प्राप्तो रामानन्द: स्वयं हरि।।


ये बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। इन्होंने राघवानंद महाराज के सानिध्य में वेद, उपनिषद आदि का ज्ञान प्राप्त किया तथा तीर्थाटन करते हुए संपूर्ण भारतवर्ष की यात्रा की और राम भक्ति का उपदेश दिया। इनका उदार दृष्टिकोण दक्षिण भारत के वीर वासव, नम्मलवर तथा पट्टकियार के विचारधाराओं से प्रभावित था। इन्होंने जाति विहीन समाज सुधार आंदोलन का सूत्रपात किया जो उस समय की क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है।

स्वामी जी ने ईश्वर भक्ति को मोक्ष का एकमात्र साधन स्वीकार किया और भगवान राघवेंद्र सरकार एवं माता सीता जी को अपना आराध्य माना। उन्हीं के आदर्शों पर चलने लगे। भगवान राम ने भी गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र, निषादराज, विभीषण, माता शबरी से लेकर बंदर, भालुओं तक पर समान प्रेम भाव से व्यवहार किया मानहुं एक भगति कर नाता के सिद्धांत को अपनाया। स्वामी रामानंदाचार्य महाराज भी इसी पथ के अनुगामी हुए। उनके नके जीवन का मूल उद्देश्य धर्म एवं भक्ति के माध्यम से समाज सुधार करना था। इन्होंने सभी वर्ग के लोगों को अपना शिष्य बनाया, मातृशक्ति को भी दीक्षा प्रदान की। समकालीन समाज में इनका प्रभाव कैसा था ? इसका ज्वलंत उदाहरण भविष्य पुराण में प्राप्त होता है, इसमें लिखा है कि – रामानंद के प्रभाव के कारण बहुत से मुसलमान वैष्णव होकर गले में तुलसी माला, जीव्हा में राम नाम तथा मस्तक पर वैष्णव तिलक धारण करने लगे। रैदास, कबीर, धन्ना, पीपा, भवानंद, सुखानंद, परमानंद, महानंद तथा आनंद उनके शिष्य थे, इन्हें द्वादश महा भागवत कहा गया। यही नहीं इनसे पद्मावती एवं सुरसरि ने भी दीक्षा प्राप्त की। वैष्णव माताब्ज भास्कर, श्रीरामार्चन पद्धति, ब्रह्मसूत्र आनंद भाष्य, उपनिषद आनंद भाष्य, श्रीमद् भागवद्गीता महाभाष्य उनकी रचनाएं हैं। उनके विषय में कहा गया है कि – जगतगुरु श्री स्वामी रामानंदाचार्य जी पर्वतीय निरंतर प्रवाहित जल स्रोत के समान थे जिसमें मधुर सुख के रूप में जल बुदबुदा रहा था,जो सांसारिक दु:ख से संतप्त हृदय की तृष्णा को शांत करने में समर्थ था। निःसंदेह स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज ने मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद दुःख संतप्त हिंदू समाज की तृष्णा को शांत किया। समाज के प्रतिष्ठित वर्गों को ही संतुष्ट नहीं किया बल्कि शूद्रों को भी समान अधिकार देकर जाती -पाती की भावना को शिथिल कर उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने से रोका। कबीर को अपना शिष्य बनाकर हिंदू मुस्लिम समन्वयवाद का मार्ग प्रशस्त किया। उनके विचारों से प्रभावित होकर उत्तर भारत में कबीर, महाराष्ट्र में नामदेव,पंजाब में नानक एवं बंगाल में चैतन्य ने समाज तथा धर्म सुधार आंदोलन को प्रारंभ किया।

क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से स्वामी जी ने अपने विचारों का प्रचार किया परिणाम स्वरुप उनके अनुयायियों ने गुजराती, मराठी, बंगाली तथा हिंदी भाषा के माध्यम से समाज सुधार संबंधी विचारों का प्रचार करके संपूर्ण भारतवर्ष की जनता में नवीन क्रांतिकारी चेतना जागृत की। माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी को उनकी 727 वीं जयंती मनाई जा रही है। उनके संदर्भ में धर्म शास्त्रों में यहां तक कहा गया है कि- रामानंद: स्वयं राम: प्रादुर्भूतो महितले। अर्थात स्वामी रामानंदाचार्य जी महाराज स्वयं साक्षात भगवान श्री रामचंद्र जी के ही अवतार थे।

       - *राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास*(पीठाधीश्वर श्री दूधाधारी मठ रायपुर एवं श्री शिवरीनारायण मठ)

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