‘महाराज’ के खिलाफ हुए BJP के पुराने नेता: समर्थक ने कहा- विरोध करने वालों की राजनीतिक पारी लंबी नहीं

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मध्यप्रदेश2 घंटे पहलेलेखक: राजेश शर्मा
- हर शनिवार पढ़िए और सुनिए- ब्यूरोक्रेसी और राजनीति से जुड़े अनसुने किस्से
भाजपा संगठन और सत्ता में कोर ग्रुप बड़ा पावरफुल होता है। हर बड़े फैसले कोर ग्रुप की बैठक में या फिर इसके सदस्यों की सहमति से होते हैं, लेकिन इसमें ‘महाराज’ की उनके कद के हिसाब से भागीदारी नहीं दिखाई दे रही है।
हाल ही में ‘महाराज’ के प्रभाव वाले बड़े जिले का अध्यक्ष बदला गया। इसमें उनकी राय तक नहीं ली गई। इससे पहले मेयर पद के चुनाव में भी ऐसा ही हुआ। सुना है कि उस इलाके के पुराने और खांटी बीजेपी नेता ‘महाराज’ के खिलाफ एकजुट हो गए हैं।
इसी हफ्ते की शुरुआत में हुई बीजेपी कोर कमेटी की बैठक से ‘महाराज’ के बाहर निकलने पर सोशल मीडिया में राजनीतिक कयासबाजी फैल गई। उनके नाराज होकर जाने की बात कही जाने लगी। भले ही ‘महाराज’ को अलग-थलग करने की कोशिश हो रही हो, लेकिन उनके समर्थकों में किसी भी तरह का भय नहीं है।
उनके एक करीबी नेता ने कहा- जो उनका (महाराज) विरोध कर रहे हैं, उनकी राजनीतिक पारी लंबी नहीं बची है, इसलिए वे फिलहाल सीधी लड़ाई मोल नहीं लेना चाहते। वे बहुत ही कम समय में आलाकमान के काफी करीब आ चुके हैं। वह अब मोदी-शाह के महाराज हैं। दोनों नेता कई मंचों से उनकी खुलकर तारीफ कर चुके हैं।
‘महाराज’ की महिमा देखकर प्रदेश के दूसरे बड़े नेता अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित हैं, लेकिन ‘महाराज’ किसी जल्दीबाजी में नहीं हैं, क्योंकि वे अपने आप को लंबी रेस का घोड़ा मानते हैं। वैसे भी ‘महाराज’ आसानी से अपने पत्ते नहीं खोलते।

‘सरकार’ की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे महाराज समर्थक
राजनीति में जैसा आंखों से दिखता है, वैसा होता नहीं। यहां ना कोई स्थाई दोस्त होता है, ना दुश्मन। सियासी लाभ-हानि के हिसाब से चीजें बदलती रहती हैं। पिछले कुछ दिनों से सत्ताधारी खेमे में ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है।
महाराज के कट्टर समर्थक किसी ना किसी बहाने से ‘सरकार’ के करीब जा रहे हैं। एक मंत्री जिसने पिछले दिनों ‘सरकार’ की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे, वे उनकी तारीफ के पुल बांधने लगे हैं। एक मंत्री ने तो ‘सरकार’ को उनकी पेंटिंग भेंट की। बुधवार को सीएम हाउस में आयोजित डिनर में भी महाराज के समर्थक ‘सरकार’ की तारीफ में कसीदे पढ़ते सुने गए।
इस नई सियासत पर एक नेता पूरी नजर रख रहे हैं। वे कहते हैं- मंत्रियों को लगता है कि अब मंत्रिमंडल विस्तार होगा तो विभागों की अदला-बदली भी होगी। ऐसे में जिनका परफॉर्मेंस ठीक नहीं है, उनको चिंता होना स्वाभाविक है। ऐसे में ‘सरकार’ को साधे रखने में ही उन्हें अपनी भलाई दिखाई दे रही है। यदि ऐसा नहीं भी हुआ तो जिलों के प्रभार बदला जाना तो तय है।

अरुण यादव पिक्चर से बाहर, अब ‘शेरा’ को कमान
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की एमपी में 20 नवंबर को एट्री होगी, लेकिन इससे पहले यात्रा का प्रभारी बदल दिया गया। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव को यात्रा का बुरहानपुर में स्वागत करने के लिए प्रभारी बनाया गया था। अचानक उनसे जिम्मेदारी लेकर निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा को दे दी गई।
साफ है कि इस फैसले से पार्टी के अंदर चल रही कलह खुलकर सामने आ गई है। अरुण यादव को दिग्विजय सिंह का भरोसेमंद माना जाता है। इसके साथ ही उनकी गिनती राहुल गांधी के करीबियों में होती है। ऐसे में उन्हें पिक्चर से बाहर किए जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सुना है कि शेरा ने तन-मन-धन से यात्रा का स्वागत करने का वादा किया है। जबकि यादव ऐसा करेंगे, इस पर पीसीसी को थोड़ा संदेह था। लिहाजा बदलाव कर दिया।

‘दंबग’ आईएएस से पंगा महंगा पड़ा
‘सरकार’ ने एक जिले के एसपी को सिर्फ इसलिए हटा दिया, क्योंकि उन्होंने कलेक्टर को सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई थी। वैसे भी कलेक्टर-एसपी में पटरी नहीं बैठ रही थी। इतना ही नहीं, जो काम एसपी को करना चाहिए था, वह कलेक्टर को करना पड़ रहा था।
बता दें, कलेक्टर महिला है, जिसकी कार्यशैली किसी दबंग अफसर जैसी ही है। उन्होंने माफिया से कई बार लोहा लिया। इस दौरान एसपी ने साथ देना तो दूर, वह कर्मचारियों को ही परेशान करने लगे। सुना है कि माफिया की तरफ से कलेक्टर को धमकी मिल रही थी।
ये भी सुना है कि संभागीय कमिश्नर तक शिकायत पहुंची कि एसपी कर्मचारियों को बेवजह परेशान कर रहे हैं। इसके बाकायदा प्रमाण दिए गए। संभागीय कमिश्नर ने 2 दिन में जांच कर सरकार को रिपोर्ट भेज दी। फिर क्या था, छुट्टी के दिन एसपी को हटाने का आदेश जारी हो गया।
सुना तो यह भी है कि एसपी को राजभवन की शह थी, इसलिए वह कलेक्टर को तवज्जो नहीं दे रहे थे। बता दें कि कमलनाथ सरकार में इस पुलिस अफसर का जलवा था। क्योंकि वह एक कांग्रेसी पूर्व मंत्री के दामाद हैं।

कलेक्टर के तबादले पर पटाखे फूटे
लंबे समय बाद सरकार ने मैदानी अफसरों के ट्रांसफर किए। एक, दो नहीं, बल्कि 15 जिलों के कलेक्टर बदल दिए। इस सूची में एक नाम ऐसा था, जिसको ‘सरकार’ का सबसे खासमखास माना जाता है। सत्ताधारी दल के नेता भी ‘सरकार’ तक अपनी पहुंच बनाने के लिए इस अफसर का सहारा लेते थे, लेकिन यह अफसर कई नेताओं की आंखों में किरकिरी भी बन गया था।
सुना है कि जैसे ही उनका तबादला आदेश जारी हुआ, सत्ताधारी दल के कई कार्यकर्ता उनके निवास के बाहर पहुंच गए। यहां उन्होंने आतिशबाजी कर जश्न मनाया। बता दें, मालवा के सबसे बड़े जिले में लंबी पारी खेलने के बाद वह राजधानी में पदस्थ किए गए हैं। फिर उन्हें नई जिम्मेदारी ऐसी मिली है, जिसमें वे ‘सरकार’ के करीब ही रहेंगे।

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे
एक काॅरपोरेशन के अध्यक्ष के पास एक जिले का प्रभार है। वे कलेक्टर पर निजी काम करने का लगातार दबाव बना रहे थे, लेकिन कलेक्टर ने उनकी एक नहीं सुनी। फिर क्या था, नेताजी ने पहले सरकार से कलेक्टर को हटाने का आग्रह किया, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद उन्होंने संगठन में कलेक्टर की कई शिकायतें की।
हुआ यह कि संगठन के दबाव में सरकार ने कलेक्टर को हटा दिया। नेताजी को मंत्रालय से बाकायदा सूचना दी गई कि आपने कहने पर कलेक्टर को हटाया जा रहा है। यह सुनते ही उनका सीना 56 इंच का हो गया, लेकिन जब आदेश जारी हुआ तो नेताजी के पैर के नीचे से जमीन खिसक गई हो, क्योंकि कलेक्टर को उनके ही काॅरपोरेशन में एमडी बना दिया गया।
इस पर एक अफसर की टिप्पणी- सरकार में तो ‘सरकार’ की ही चलेगी। अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे। नेताजी ने अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है। बता दें, नेताजी कमाऊ काॅरपोरेशन के अध्यक्ष हैं। जबकि अफसर विंध्य के कोयले की खान वाले जिले के कलेक्टर थे।

और अंत में…
‘सरकार’ ने ब्रेकफास्ट पर बुलाकर पिला दी घुट्टी
बड़े ओहदे से लेकर मैदानी अफसरों की नई पदस्थापना पर कहा जा रहा है कि यह अगले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर की गई है। ऐसे ही एक प्रमुख सचिव को विभाग बदलने पर आपत्ति थी। वजह यह थी कि वे एक बड़े आयोजन की तैयारी में दिन-रात एक किए हुए थे। इस बीच उन्हें हटा दिया। उन्होंने प्रशासनिक मुखिया को अपनी आपत्ति से अवगत कराया है।
सुना है कि इस अफसर को ‘सरकार’ ने ब्रेकफास्ट पर बुलाकर घुट्टी पिला दी कि उन्हें जो नई जिम्मेदारी दी गई है, वह अगले चुनाव के हिसाब से बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्हें बताया गया कि केंद्रीय नेतृत्व ने ‘पानी’ पर फोकस किया है। इस लिहाज से विभाग की कमान आप जैसे काबिल अफसर को दी गई है। फिर क्या था, दो दिन से नाराज साहब खुशी-खुशी 6, श्यामला हिल्स से बाहर निकले।

ये भी पढ़ें…
एक ‘कमल’ को साधा तो दूसरे ‘कमल’ ने निपटा दिया
नगरीय निकाय सेवा के एक अफसर के ट्रांसफर आदेश ‘सरकार’ के निर्देश मिलने के आधे घंटे बाद जारी हो गए। स्पीड इतनी… मानो फाइल को पंख लग गए हों, जबकि किसी भी ट्रांसफर आदेश निकालने में जिन प्रक्रियाओं को पूरा करना पड़ता है, उसमें कम से कम एक दिन से कम समय तो लग ही नहीं सकता। अब आधे घंटे में हुआ यह आदेश राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे में चर्चा का विषय बना हुआ है। ‘महाराज’ को तवज्जो से बीजेपी में खलबली

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उज्जैन दौरे पर जिस तरह ‘महाराज’ को तवज्जो मिली, उसने बीजेपी नेताओं की नींद उड़ा दी है। मोदी जब महाकाल मंदिर में पूजा करने गए, तो मुख्यमंत्री और राज्यपाल के अलावा ‘महाराज’ यानी सिंधिया भी उनके साथ गए, जबकि मोदी कैबिनेट में शामिल एमपी के नेता सभास्थल पर पहुंचे। ‘महाराज’ को मिले वेटेज से बढ़ीं BJP नेताओं की धड़कनें

2018 में सत्ता गंवाने वाली BJP अब मिशन 2023 के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। मैदानी स्तर पर तो रणनीति तैयार की ही जा रही है, नेताओं को भी एकजुट रहने की नसीहत दी जा रही है। हाल ही में रातापानी के जंगल में सियासी मंथन के लिए जुटे BJP नेताओं की बैठक में दिल्ली से आए एक बड़े पदाधिकारी ने कहा कि चुनाव जीतना है, तो पुरानी दोस्ती को जिंदा करो। IAS की पत्नी से बदसलूकी की, 2 का ट्रांसफर

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने पहली बार उज्जैन में कैबिनेट बैठक की। इसमें मुख्य कुर्सी पर भगवान महाकाल की तस्वीर रखी गई। सीएम और सभी मंत्री अगल-बगल बैठे। ‘सरकार’ की इस पहल की खूब चर्चा हुई, लेकिन बैठक से पहले एक वाकया ऐसा हुआ, जिसने थोड़ी देर के लिए पुलिस के होश उड़ा दिए। पुलिस अफसर के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया कि ‘सरकार’ को आगे जाने दें या ‘पंडितजी’ को, क्योंकि अपने ‘सरकार’ तो पंडित जी हैं। ‘राजा साहब’ के समर्थकों के टूटे सपने

सियासत में सब कुछ खुलकर नहीं कहा जाता है। इशारों में समझा दिया जाता और समझने वाले समझ जाते हैं। एमपी की राजनीति में पिछले दिनों ऐसा ही हुआ। जो दिख रहा था, हकीकत उससे कहीं अलग थी। पोषण आहार पर एजी (महालेखाकार) की रिपोर्ट लीक होना ‘सरकार’ पर अटैक था, लेकिन सियासत पर बारीक नजर रखने वाले अतीत की घटनाओं को जोड़कर वहां तक पहुंच गए, जहां इसकी स्क्रिप्ट तैयार की गई। ग्वालियर में बन रही ‘सरकार’ के ताले की डुप्लीकेट चाबी!

मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘महाराज’ के बदले हुए अंदाज से सियासी गर्माहट बढ़ती जा रही है। इससे ‘सरकार’ के खेमे में खलबली है, लेकिन विरोध-समर्थन का खेल सार्वजनिक होने में वक्त लगेगा, क्योंकि पिक्चर अभी धुंधली है। सिंधिया अपनी महाराज वाली छाप मिटा तो नहीं रहे, लेकिन इसे अपना अतीत बताकर नई छवि गढ़ने में जुट गए हैं। ‘सरकार’ के सामने नरोत्तम को CM बनाने के लगे नारे…

‘जहां दम वहां हम’ नेताओं पर यह जुमला बिल्कुल फिट बैठता है। राजनीति की रवायत ही कुछ ऐसी है। बात MP की करें तो पिछले एक साल में जब-जब बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व की नजरें यहां पड़ी, नेताओं में खलबली मच गई। बदलाव की बयार चलने के कयास भर से आस्था डोलने लगी। इस बार भी जब ‘सरकार’ बदलने की हवा उड़ी। ‘सरकार’ बदलने की हवा उड़ी तो आस्था डोलने लगी…
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