संकेत साहित्य समिति द्वारा अन्नदाताओं पर केन्द्रित काव्य गोष्ठी, हिंदी की दुनिया बहुत वृहद और गौरवशाली – जवाहर कर्नावट

रायपुर। विश्वविख्यात हिंदी विशेषज्ञ और हिंदी की पत्रिकाओं पर वैश्विक अनुसंधान करने वाले डॉ जवाहर कर्नावट ने संकेत साहित्य समिति के समारोह में व्याख्यान देते हुए कहा कि हमें हिंदी की प्रगति और दुनिया में उसके वर्चस्व पर गौरव करना चाहिए। आज सौ से अधिक देशों में हिंदी का प्रसार है।

डॉ चित्तरंजन कर, गिरीश पंकज, बलदाऊ राम साहू और डॉ माणिक विश्वकर्मा के आतिथ्य में आयोजित इस समारोह में डॉ जवाहर कर्नावट ने मारीशस, फिजी, गुयाना सहित अनेक भारतवंशी देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि 1830 से ही हिंदी इन देशों के भारतीय की आत्मा रही है। इन देशों में हाथ से लिखकर पत्रिका और समाचार-पत्र प्रकाशित किए गये। इसी तरह इन देशों में महात्मा गांधी के प्रभाव से अध्ययन और अध्यापन भी प्रारंभ हुआ। आज फिजी में हिंदी एक राजभाषा के रूप में मान्य है। आज डिजिटल युग में भी न्यूजीलैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, दुबई और जापान में ई पत्रिका हिंदी में निकल रही है। समारोह में अनेक कवियों ने काव्य पाठ भी किया।

वृंदावन हॉल रायपुर में संकेत साहित्य समिति के तत्वावधान में डॉ. चितरंजन कर के मुख्य आतिथ्य, गिरीश पंकज की अध्यक्षता एवं बलदाऊ राम साहू, राकेश गुप्ता ‘रूसिया’, विजय मिश्रा ‘अमित’ के विशिष्ट अतिथि में अन्नदाताओं पर केन्द्रित काव्य गोष्ठी तथा जवाहर कर्नावट द्वारा ‘हिंदी का वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ. स्नेहलता पाठक, डॉ. सुधीर शर्मा एवं रामेश्वर शर्मा विशेष रूप से उपस्थित रहे।

मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलन के बाद सभी अतिथियों का अंगवस्त्र, श्रीफल एवं नन्हें पौधे से स्वागत किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में विषय की प्रस्तावना देते हुए संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन के साथ संकेत साहित्य समिति, अन्नदाताओं पर केन्द्रित काव्य गोष्ठी एवं व्याख्यान की महत्ता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के प्रथम चरण में मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि कृषि कार्य सभ्यता का पहला चरण माना जाता है। कृषि की शुरुआत हुई तो सभ्यता आई । उन्नत कृषि कल्पना की देन है। दूसरे शब्दों में कहें तो कल्पना अविष्कार की जननी होती है। मुख्य अतिथि साहित्यकार गिरीश पंकज ने अन्नदाताओं पर केन्द्रित काव्य गोष्ठी की प्रशंसा करते हुए कहा कि साहित्यकार का दायित्व बनता है कि वह ऐसे अनछुए विषयों पर क़लम चलाएं, जिससे समाज एवं देश को लाभ हो। इस संदर्भ में उन्होंने किसानों के हितों की रक्षा के लिए की गई अपनी पद यात्रा का संस्मरण भी सुनाया। विशिष्ट अतिथि बलदाऊ राम साहू ने पोला त्योहार की पूजा पद्धति का सुन्दर चित्रण किया। राकेश गुप्ता ने किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या को भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं बताया एवं विजय मिश्रा अमित ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं किसानों के जीवन में पोला त्योहार की अहमियत को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के द्वितीय चरण में वरिष्ठ साहित्यकार एवं संपादक जवाहर कर्नावट ने ‘हिंदी का वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर अपना सारगर्भित व्याख्यान देते हुए विश्वस्तर पर हिंदी के उन्नयन एवं विकास के लिए हो रहे प्रयासों पर विस्तार से प्रकाश डाला। सुषमा पटेल एवं पल्लवी झा रूमा के कुशल संचालन में रायपुर एवं आसपास से आए जिन पैंतीस से अधिक रचनाकारों ने अपनी कविताएँ प्रस्तुत कीं, उनमें – डॉ. चितरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, सुरेन्द्र रावल, आर.डी. अहिरवार, संतोष सिंह, रामचन्द्र श्रीवास्तव, बलदाऊ राम साहू, राकेश गुप्ता’रूसिया’, डॉ. दीनदयाल साहू, राजेन्द्र रायपुरी, डॉ. कोमल प्रसाद राठौर, गोपाल सोलंकी, शकुंतला तरार, डॉ.रविन्द्र सरकार, हरीश कोटक, पल्लवी झा, सुषमा पटेल, पूर्वा श्रीवास्तव, सुमन शर्मा बाजपेयी, सीमा पांडेय, नीलिमा मिश्रा, अर्चना श्रीवास्तव, दिलीप वरवंडकर, लवकुश तिवारी, भारती यादव मेघ, मन्नूलाल यदु,, छबिलाल सोनी, यशवंत यदु, माधुरी कर, प्रेमलाल पटेल, सोमेन्द्र यादव, ऋषि साव, रीना अधिकारी, गणेश दत्त झा एवं वीरेन्द्र शर्मा अनुज के नाम प्रमुख हैं।