Chhattisgarh

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज जी ने श्रोताओं को संबोधित किया

जांजगीर – नैला, 27 अगस्त ।अग्रसेन भवन के सामने चल रहे श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर वृंदावन धाम के प्रख्यात भागवत प्रवक्ता श्री हित ललित वल्लभ जी महाराज ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि सत्कर्म करते हुए मन और वाणी को मधुर रखना चाहिए, तभी हमारा जीवन सार्थक होगा।

महाराज जी ने गज और ग्राह प्रसंग में बताया कि जब मगर ने हाथी का पैर पकड़ लिया, तो उसने अपने बचाव के सभी प्रयास किए। अंत में, हाथी ने कमल पुष्प लेकर गोविंद प्रभु का स्मरण किया, तो भगवान तुरंत प्रगट होकर रक्षा करने आ गए। भगवान ने मगर से कहा, “मेरे भक्त का पैर छोड़ दे।” मगर ने कहा, “मैं कैसे इसका पैर छोड़ दूं? इसने आपके पैर पकड़ रखे हैं, इसलिए मैंने इसका पैर पकड़ रखा है।” महाराज जी ने कहा कि भक्त चरण आश्रय से उद्धार निश्चित होता है।

महाराज जी ने समुद्र मंथन की कथा में कहा कि मंथन के दौरान 14 रत्नों की प्राप्ति हुई। भगवान धन्वंतरि जी अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए। राक्षसों ने अमृत कलश को छीन लिया, तब भगवान मोहिनी अवतार लेकर प्रकट हुए और देवताओं को अमृत पान कराया। अमृत पान करने से देवता बलवान हो गए और देवासुर संग्राम में विजय प्राप्त की।

वामन अवतार के संदर्भ में, महाराज जी ने बताया कि वामन भगवान राजा बलि के यज्ञ में पधारे। बली को अपने दानी होने का बड़ा गर्व था। वामन देव ने तीन पग भूमि मांगी और त्रिलोकी को नाप लिया। केवल दो पग में, और कहा, “तीसरा पैर कहां रखूं?” तब राजा बलि ने अपना सिर झुका दिया और कहा, “तीसरा पैर मेरे सिर पर रख दीजिए।” वामन भगवान बलि के समर्पण से प्रसन्न हुए और सुतल लोक का राज्य दे दिया।

महाराज जी ने श्री राम जन्म की कथा श्रवण कराते हुए कहा कि राम चरित्र को समझे बिना जीव कृष्ण चरित्र का अधिकारी नहीं हो सकता। इसके बाद, उन्होंने श्री कृष्ण के जन्म का सुंदर वर्णन किया। भक्त भाव विभोर हो नृत्य करने लगे और उपस्थित सभी भक्तों को बधाइयां बांटी गईं। बधाइयां गाई गईं, “नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की”।

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