कृष्ण के लिए धन लेकर उज्जैन आए थे कुबेर: सांदीपनि आश्रम में 1100 साल पुरानी प्रतिमा की अनूठी कहानी

[ad_1]
आनंद निगम। उज्जैन9 मिनट पहले
कुबेर… यानी धन के देवता। आज धनतेरस पर कुबेर की पूजा की जा रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देशभर में कुबेर की गिनी-चुनी प्रतिमाओं में से 2 मध्यप्रदेश में हैं। एक विदिशा तो दूसरी प्रतिमा उज्जैन में है। उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में स्थापित कुबेर की प्रतिमा की कथा भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है।
मंदिर के पुजारी शैलेंद्र व्यास ने बताया, उज्जैन में स्थापित बेसाल्ट से बनी कुबेर की प्रतिमा शुंग काल की है। मंदिर में कुबेर की प्रतिमा, भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा के साथ स्थापित की गई थी। मंदिर के द्वार पर खड़े नंदी की अद्भुत प्रतिमा भी है। बता दें, सांदीपनि आश्रम में श्रीकृष्ण बाल्य काल में शिक्षा लेने आए थे।
सांदीपनि आश्रम में आज धनतेरस पर धन के देवता कुबेर को सूखे मेवे, मिठाई और फलों का भोग लगाया जा रहा है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं।

श्रीकृष्ण लेने आए थे कुबेर को
कुबेर मंदिर के पंडित शैलेंद्र व्यास ने बताया कि जब द्वारका नगरी को बनाने के लिए धन वैभव की जरूरत पड़ी, तो भगवान श्रीकृष्ण खुद उन्हें लेने उज्जैन सांदीपनि आश्रम आए थे। उन्हें ले जाकर द्वारका नगरी का निर्माण किया था।

देश में यहां भी कुबेर प्रतिमाएं
उत्तर प्रदेश के मथुरा, बिहार के पटना और राजस्थान के भरतपुर में भी कुबेर की प्रतिमाएं हैं। सनातन धर्म में कुबेर को धनाधिपति माना गया है। इनकी पत्नी यक्षिणी हैं। इनका पूजन करने से स्थिर (अचल) लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। सभी वेद पुराणों में कुबेर का वर्णन मिलता है। सोने की लंका का निर्माण भी कुबेर ने ही किया था।
कुबेर, भगवान नहीं, यक्ष हैं
कुबेर किन्नरों के अधिपति, दिक्पाल यानी उत्तर दिशा के रक्षक, मंदिर के धन के रक्षक और अक्षय निधियों के स्वामी हैं। कुबेर, भगवान नहीं यक्ष हैं। यक्ष धन को भोग नहीं सकते। बल्कि उसकी रक्षा करते हैं। कुबेर को भगवान शिव ने उत्तर दिशा का स्वामी बनाया है। यानी वो दिक्पाल हैं। इसलिए पुराने मंदिरों में बाहरी ओर सभी दिशाओं में यक्ष की मूर्तियां बनी हैं। ये मंदिरों के धन के रक्षक के रूप में होते हैं। ये 9 निधियों के स्वामी भी होते हैं। इसलिए इन्हें ब्रह्मा ने अक्षय निधियों का स्वामी बनाया है।
विदिशा में 2200 साल पुरानी कुबेर की 12 फीट की प्रतिमा

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि यह प्रतिमा बैस नदी (विदिशा) में उल्टी पड़ी थी। लोग चट्टान समझकर इसकी पीठ पर कपड़े धोया करते थे। सालों पहले जब नदी का पानी कम हुआ, तो प्रतिमा की हकीकत का खुलासा हुआ। इसके बाद इसे संग्रहालय लाया गया। प्रतिमा सिविल लाइंस स्थित जिला पुरातत्व संग्रहालय भवन के प्रवेश द्वार पर देखी जा सकती है।
विदिशा में कुबेर की प्राचीन प्रतिमा है। 2200 साल पुरानी इस प्रतिमा की ऊंचाई 12 फीट है। यह आज भी सिविल लाइंस स्थित जिला पुरातत्व संग्रहालय भवन के प्रवेश द्वार पर स्थापित है। कुबेर की इस विशाल प्रतिमा के बाद एक अन्य कक्ष में कुबेर की पत्नी यक्षिणी की भी 5 फीट ऊंची प्रतिमा रखी है। वह भी इसी प्रतिमा की समकालीन बताई जाती है।
ये भी पढ़िए…
सांदीपनी आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने सीखीं 64 कलाएं

उज्जैन का सांदीपनि आश्रम… ये वही आश्रम है, जहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भाई बलराम और दोस्त सुदामा के साथ बचपन में पढ़ाई की। ये आश्रम उज्जैन के अंकपात क्षेत्र में स्थित है। मंदिर में श्रीकृष्ण, उनके भाई बलराम और मित्र सुदामा की पढ़ाई करते हुए प्रतिमाएं हैं। यहीं बैठकर भगवान ने 64 कलाएं सीखीं थी। पंडित रूपम व्यास के अनुसार द्वापर युग में कंस का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण का मथुरा में यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव जी को उनकी पढ़ाई-लिखाई की चिंता सताने लगी। उन्हें महर्षि सांदीपनि व्यास जी के बारे में पता चला कि वे एक प्रकांड विद्वान और शिव उपासक हैं। उन्होंने तय किया कि श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम को पढ़ाई के लिए सांदीपनि महर्षि के आश्रम ही भेजेंगे। पूरी खबर पढ़िए
Source link