लैलूंगा का ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल बना पहचान, देशभर में बढ़ी मांग

रायगढ़। जिले के लैलूंगा क्षेत्र का ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल अपनी खास सुगंध, स्वाद और गुणवत्ता के कारण अब देशभर में पहचान बना रहा है। पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली इस धान की किस्म ने किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। प्रशासन और कृषि विभाग के सहयोग से इसका उत्पादन और विपणन व्यवस्थित रूप से बढ़ाया जा रहा है।
लैलूंगा क्षेत्र की विशेष जलवायु—दिन में पर्याप्त गर्मी और रात में हल्की ठंडक—जंवाफूल चावल की गुणवत्ता को खास बनाती है। यही वजह है कि इसकी सुगंध और स्वाद अन्य धानों से अलग है, जिससे बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में यह चावल छत्तीसगढ़ के अलावा बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना, लद्दाख और कारगिल जैसे क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। इसका बाजार मूल्य लगभग 150 रुपये प्रति किलो है, जिससे किसानों को अच्छा मुनाफा मिल रहा है।
किसानों के अनुसार, जंवाफूल चावल की खेती लाभकारी साबित हो रही है। लैलूंगा के किसान चंद्रशेखर पटेल ने बताया कि उन्होंने इस वर्ष 4 एकड़ में इसकी खेती की, जिसमें प्रति एकड़ करीब 30 हजार रुपये लागत आई, जबकि आय 1 लाख रुपये से अधिक रही। इसी तरह ग्राम खैरबहार के किसान भवानी पंडा वर्ष 2015 से जैविक खेती कर रहे हैं और जंवाफूल चावल से उन्हें पारंपरिक धान की तुलना में अधिक लाभ मिल रहा है। वे वर्तमान में 2 एकड़ में खेती कर रहे हैं और इसे 20 एकड़ तक बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।
इस चावल की खेती पूरी तरह जैविक पद्धति से की जाती है, जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं होता। हरी खाद के उपयोग से खेत की उर्वरता बनाए रखी जाती है, जिससे यह चावल स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
प्रशासन और कृषि विभाग किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बीज उपलब्ध कराकर इस फसल को बढ़ावा दे रहे हैं। किसान समूहों और एफपीओ के माध्यम से उत्पादन और विपणन को भी मजबूत किया जा रहा है। पिछले वर्ष जहां करीब 700 एकड़ में इसकी खेती हुई थी, वहीं इस वर्ष इसे बढ़ाकर 2000 एकड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल अब लैलूंगा की पहचान बन चुका है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ा रहा है, बल्कि क्षेत्र को नई पहचान दिलाते हुए किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।




