मधुमक्खी पालन से किसानों के जीवन में आई मिठास, आय के नए द्वार हुए खुले

कोरबा,08 फ़रवरी 2026।
जिला कोरबा में राज्य पोषित योजनांतर्गत संचालित परागण योजना किसानों के लिए आर्थिक संबल बनकर उभरी है। इस योजना के माध्यम से मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देकर न केवल शहद उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है, बल्कि किसानों को अतिरिक्त आय और स्वरोज़गार के अवसर भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। विशेष रूप से विकासखण्ड पोंड़ी-उपरोड़ा के ग्राम कुटेश्वर, नगोई, बझेरा, सिंघिया और जुराली में इस योजना ने किसानों के जीवन में उल्लेखनीय बदलाव लाया है।
इन गांवों के किसान पहले तक मुख्य रूप से धान की खेती पर निर्भर थे, जिससे उनकी आमदनी सीमित रहती थी। मौसम की अनिश्चितता और बढ़ती लागत के कारण कृषि से अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा था। ऐसे में मधुमक्खी पालन किसानों के लिए कम लागत और अधिक लाभ का एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आया है। इस योजना से जुड़कर कई किसान और युवा आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
उद्यानिकी अधिकारी श्री पी.एस. सिंह ने बताया कि किसानों ने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से संपर्क कर मधुमक्खी पालन से जुड़ी तकनीकी जानकारियाँ प्राप्त कीं। कृषि उद्यान केंद्र कटघोरा तथा शासकीय उद्यान रोपणी में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को मधुमक्खी पालन की वैज्ञानिक विधियाँ सिखाई गईं। प्रशिक्षण के बाद किसान सफलतापूर्वक मधुमक्खी पालन कर अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन से एक पेटी से साल भर में लगभग 15 से 25 किलोग्राम शहद का उत्पादन होता है। यदि कोई किसान 20 पेटियों का संचालन करता है, तो वह एक से दो लाख रुपये तक की वार्षिक आमदनी प्राप्त कर सकता है। इसके साथ ही मधुमक्खियों द्वारा फसलों में परागण बढ़ने से सब्जी, दलहन, तिलहन और फलदार फसलों की पैदावार में 15 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हो रही है।
शहद के अलावा मोम, पराग, रॉयल जेली और मधुमक्खी विष जैसे उत्पादों की दवा, कॉस्मेटिक और आयुर्वेदिक उद्योगों में लगातार बढ़ती मांग किसानों की आय के नए स्रोत खोल रही है। मधुमक्खी पालन की विशेषता यह है कि इसके लिए बड़ी भूमि की आवश्यकता नहीं होती। किसान अपने घर के आंगन या खेतों के किनारे आसानी से पेटियाँ रखकर उत्पादन कर सकते हैं।
योजना के अंतर्गत प्रत्येक हितग्राही को 45 मधुमक्खी कॉलोनियाँ एवं 45 पेटिकाएँ प्रदान की गई हैं। एक मधुमक्खी छत्ते की लागत 2000 रुपये निर्धारित है, जिसमें 50 प्रतिशत अथवा अधिकतम 1000 रुपये का अनुदान किसानों को दिया जा रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य परागण में वृद्धि कर फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाना तथा किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।




