वेदांता पावर प्लांट हादसे पर गरमाई राजनीति, ‘कॉर्पोरेट क्रिमिनल नेग्लिजेंस’ बताते हुए चेयरमैन सहित जिम्मेदारों की गिरफ्तारी की मांग

जांजगीर-चांपा/सक्ती। सिंघीतराई स्थित वेदांता समूह के पावर प्लांट में 14 अप्रैल 2026 को हुए भीषण बॉयलर/स्टीम विस्फोट को लेकर सियासत तेज हो गई है। भारतीय जनाधिकार पार्टी के संयोजक अध्यक्ष दीपक दुबे ने इस घटना को “कॉर्पोरेट क्रिमिनल नेग्लिजेंस” का गंभीर मामला बताते हुए कंपनी के चेयरमैन अनिल अग्रवाल सहित सभी जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ तत्काल नामजद एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की मांग की है।
प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दुबे ने कहा कि इस हादसे में कई श्रमिकों की मौत हुई है और बड़ी संख्या में श्रमिक गंभीर रूप से झुलस गए हैं, जो औद्योगिक सुरक्षा तंत्र की घोर विफलता को दर्शाता है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार उच्च दबाव और तकनीकी खराबी के कारण बॉयलर में विस्फोट हुआ, जिससे अत्यधिक तापमान की भाप फैल गई और मौके पर मौजूद श्रमिक इसकी चपेट में आ गए। उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के समय न तो कोई प्रभावी चेतावनी प्रणाली सक्रिय थी और न ही सुरक्षित निकासी की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध थी।
दुबे ने आरोप लगाया कि संबंधित परियोजना पूर्व में अधूरी स्थिति में लगभग 9 वर्षों तक बंद रही थी और अधिग्रहण के बाद बिना समुचित तकनीकी मूल्यांकन, संरचनात्मक परीक्षण और व्यापक सुरक्षा सत्यापन के जल्दबाजी में पुनः चालू कर दी गई। उन्होंने कहा कि श्रमिकों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण और सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध नहीं कराया गया तथा ठेका श्रमिकों से जोखिमपूर्ण कार्य कराया जाना प्रत्यक्ष आपराधिक लापरवाही को दर्शाता है।
उन्होंने पर्यावरणीय अभिलेखों और EAC/Parivesh दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2016 तक यह परियोजना केवल लगभग 60 प्रतिशत ही पूर्ण हो पाई थी, जिसके बाद यह वित्तीय कारणों से बंद हो गई और बाद में दिवालिया प्रक्रिया (IBC/CIRP) में चली गई। उनके अनुसार, परियोजना को कबाड़ कीमत पर अधिग्रहित कर बिना अद्यतन सुरक्षा परीक्षण और पुनर्मूल्यांकन के संचालन शुरू कर दिया गया।
दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि परियोजना को “पब्लिक हियरिंग” से छूट दी गई, जिससे स्थानीय जनता और संभावित जोखिमों का समुचित आकलन नहीं हो सका। उन्होंने इसे गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटि बताते हुए इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही उन्होंने कहा कि परियोजना की मूल पर्यावरण स्वीकृति वर्ष 2010 की थी, जिसकी वैधता बाद में बढ़ाई गई, लेकिन यह पुराने डिजाइन और सुरक्षा मानकों पर आधारित थी। EAC द्वारा PM2.5 डेटा में पाई गई त्रुटियों को भी उन्होंने गंभीर लापरवाही का संकेत बताया।
उन्होंने मांग की कि दोषी प्रबंधन, शीर्ष अधिकारी, प्लांट प्रभारी, सेफ्टी अधिकारी और संबंधित ठेकेदारों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज कर तत्काल गिरफ्तारी की जाए। इसके साथ ही सभी तकनीकी अभिलेख, लॉगबुक, डिजिटल डेटा और CCTV साक्ष्यों को जब्त कर सुरक्षित रखने तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए उच्च स्तरीय SIT गठित करने की मांग की गई है। जांच पूरी होने तक प्लांट को तत्काल सील करने की भी मांग उठाई गई है।
मुआवजे के मुद्दे पर भी दुबे ने नाराजगी जताई। उन्होंने मृतकों के परिजनों को न्यूनतम 50 लाख रुपये, परिवार के एक सदस्य को नौकरी, गंभीर घायलों को 15 लाख रुपये की सहायता और उच्च स्तरीय निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि वर्तमान में प्रस्तावित मुआवजा न्यायसंगत नहीं है और इसकी तुलना रायपुर के सिलतरा स्थित गोदावरी पावर एंड इस्पात प्लांट हादसे से की, जहां मृतकों के परिजनों को 47-47 लाख रुपये का मुआवजा और अन्य सुविधाएं दी गई थीं।
दुबे ने चेतावनी दी कि यदि 7 दिनों के भीतर एफआईआर दर्ज कर दोषियों की गिरफ्तारी, उचित मुआवजा और घायलों के बेहतर उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई, तो मामला न्यायालय में ले जाया जाएगा। इसके साथ ही उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय हरित अधिकरण में शिकायत करने तथा पीड़ित परिवारों के साथ मिलकर अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू करने की बात कही गई है।




