देश भर में अनोखी 22 भुजाओं वाली गणेश प्रतिमा: जंगल में पड़ी मूर्ति को 70 साल पहले किया संरक्षित, अब पुरातत्व विभाग नहीं दे रहा ध्यान

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टीकमगढ़39 मिनट पहले
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शहर से तकरीबन 10 किमी दूर गणेशपुरा गांव स्थित 22 भुजाओं वाले श्री गणेश के दर्शन करने बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। गणेश महोत्सव के दौरान हर साल दूर-दूर से श्रद्धालु अद्भुत प्रतिमा के दर्शन करने पहुंचते हैं। चंदेल कालीन यह प्रतिमा भक्तों की हर मनोकामना को पूरा करने वाली है। इसलिए चुनावों के दौरान खास तौर पर बड़े-बड़े नेता यहां हाजिरी लगाते हैं।
जिले की एमपी-यूपी सीमा से लगे बानपुर गांव के पास एक प्राचीन गणेश मंदिर है। इसमें भगवान गणेश की 22 भुजाओं वाली अद्भुत प्रतिमा विराजमान है। लोगों का कहना है कि ऐसी गणेश प्रतिमा पूरे देश में कहीं और नहीं है। स्थानीय लोगों ने बताया कि ये गणेश प्रतिमा चंदेल कालीन जमाने की है। जो 70 साल पहले जंगल में पाई गई थी।
इसे दतिया के राज परिवार ने मंदिर में स्थापित किया था। मंदिर के बाहर तीन बड़े-बड़े खंडित नंदी रखे हैं। जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रतिमा को तोड़ने का प्रयास किया गया होगा। मंदिर को लेकर एक रोचक कथा भी प्रचलित है।
जंगल में पड़ी थी प्रतिमा
भगवान गणेश की ये प्रतिमा जंगल में सोई हुई मुद्रा में मिली थी। लोगों ने जब इसे उठाने का प्रयास किया तो वे इसमें सफल नहीं हो पाए। तब ग्रामीणों को सपने में भगवान गणेश ने बताया कि कोई राजपरिवार का व्यक्ति ही उन्हें उठा सकता है। तब दतिया राजपरिवार ने भगवान गणेश की इस प्रतिमा की स्थापना मंदिर में की।
पुरातत्व विभाग नहीं दे रहा ध्यान
मंदिर के पुजारी गोविंद दास शर्मा ने बताया कि करीब 12 साल पहले पुरातत्व विभाग ने इस प्रतिमा को अपने संरक्षण में लिया था, लेकिन जहां यह प्रतिमा रखी है। वहां मंदिर का निर्माण नहीं किया जा रहा है। एक कमरेनुमा मंदिर में प्रतिमा रखी है।
ऐसे पहुंचे श्री गणेश मंदिर
टीकमगढ़ से ललितपुर रोड पर बानपुर गांव से 1 किमी पहले दाएं ओर गणेशपुरा गांव के लिए एक पक्का रास्ता गया है। इस मोड़ पर पुरातत्व विभाग ने मंदिर के संबंध में बोर्ड लगाया है। करीब 1 किमी गांव के अंदर जाने पर मंदिर पहुंचा जा सकता है।
चंदेल कालीन है प्रतिमा
इस मंदिर की चार पीढ़ियों से पूजा करते आ रहे पंडित गोविंद दास शर्मा बताते है कि यह प्रतिमा पुरातत्व विभाग के अधीन है। पुरातत्व विभाग ने इस प्रतिमा को चंदेल कालीन बताया है। उनका कहना है कि पूर्व में यहां पर जंगल था। यह प्रतिमा इसी स्थान पर जमीन के अंदर पड़ी थी।
पौराणिक काल की प्रतिमा
स्थानीय लोगों के अनुसार, बानपुर के महाराज बाणासुर की पुत्री ऊषा यहां पूजा करने आती थी। यहां से थोड़ी ही दूरी पर कुंडेश्वर में स्वयं भू भोलेनाथ का मंदिर है। गणेश मंदिर के संबंध में यह भी कहा जाता है कि शिवधाम कुंडेश्वर और श्री गणेश मंदिर काफी प्राचीन है।


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