डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय का मामला: नौकरी से हटाए गए 17 कर्मचारियों के पक्ष में श्रम न्यायालय का फैसला, प्रशासन को भी दोषी माना

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सागरएक घंटा पहले
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डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय द्वारा नौकरी से हटाए गए 17 कर्मचारियों के पक्ष में केंद्रीय श्रम न्यायालय जबलपुर ने फैसला सुनाया है।
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय द्वारा नौकरी से हटाए गए 17 कर्मचारियों के पक्ष में केंद्रीय श्रम न्यायालय जबलपुर ने फैसला सुनाया है। साथ ही इन पूर्व कर्मचारियों के प्रकरण में विश्वविद्यालय प्रशासन को श्रम अधिनियम धारा 33-(क) एक्ट के उल्लंघन करने का दोषी भी पाया है। विवि में कलेक्टर एवं कमिश्नर दर पर काम करने वाले 17 कर्मचारियों ने 11 अक्टूबर 2017 में अपने पद के वर्गीकरण से संबंधित प्रकरण को केंद्रीय सहायक श्रम आयुक्त जबलपुर कार्यालय में दर्ज कराया था।
जिस पर विवि के तत्कालीन कुलसचिव कर्नल राकेश मोहन जोशी को नोटिस जारी किया गया, लेकिन विवि प्रशासन ने नोटिस को अनदेखा कर इन कर्मचारियों को आउटसोर्स कर्मचारी मानकर 25 अक्टूबर 2017 को समस्त विभागाध्यक्षों को नोटिस देकर सेवाएं समाप्त कर दी थीं। 5 साल चली सुनवाई के बाद कर्मचारियों के पक्ष में फैसला देते हुए न्यायालय ने कहा कर्मचारियों ने विवि में अपने नौकरी से संबंधित जो दस्तावेज प्राप्त किए, उससे सिद्ध होता है कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति विवि की सक्षम प्रशासनिक स्वीकृति से हुई।
इनके मासिक कार्य का भुगतान सीधे विश्वविद्यालय द्वारा इनके बैंक खाते में किया गया। विवि के अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों में वे यह सिद्ध नहीं कर पाए कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति किस आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से हुई थी। विवि में इन कर्मचारियों की नियुक्ति दैनिक वेतन भोगी, मस्टर कर्मचारी के रूप में हुई थी। कोर्ट ने फैसले की कॉपी आगामी कार्यवाही के लिए श्रम रोजगार मंत्रालय भारत सरकार को भी भेज दी है। पूर्व कर्मचारी धर्मेंद्र रजक ने कहा विवि प्रशासन को अपनी गलती सुधारते हुए हम सभी कर्मचारियों को वापस सेवा में लेना चाहिए।
उन्होंने कहा यह फैसला दीपक दुबे, धर्मेंद्र रजक, चंद्रमणि सिंह, अमित नहिरया, प्रीति रजक, अजय कन्नौजिया, संतोष नामदेव, रवि पटेल, सोनू बाेहत, राजेंद्र सिंह ठाकुर, गौरव सिंह राजपूत, अमित साहू, विवेक सेन, अभिषेक मिश्रा एवं संदीप तिवारी के पक्ष में आया है।
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