हथियार बनाने वाले सिकलीगरों का सच: हां, हम हथियार बनाते हैं, लेकिन किसी की बहन-बेटियों की इज्जत नहीं लूटते

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बड़वानी15 मिनट पहले
सिकलीगर से 200 जिंदा कारतूस बरामद…सिंगर सिद्धू मूसेवाला की हत्या में प्रयुक्त हथियार सिकलीगरों ने बनाए…खालिस्तानियों से हैं सिकलीगरों का कनेक्शन… पिछले दिनों इस तरह की खबरें आपने पढ़ी होंगी। इन खबरों को पढ़कर हमें भी लगा कि यह समुदाय समाज के लिए खतरनाक है। यह कैसे काम करते हैं? यह जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम इनके गढ़ पहुंची। अवैध हथियार बनाने और बेचने वाले सिकलीगरों का देश में सबसे कुख्यात ठिकाना मध्यप्रदेश के अंतिम छोर पर महाराष्ट्र सीमा से सटा हुआ गांव उमर्टी है।
जब हम इनके ठिकानों की रैकी करने पहुंचे, तो कच्चे मकान और एक के बाद एक गांव में आ रही स्कूल बसों से उतरते बच्चों को देखकर एक बात पक्की हो गई कि सिर्फ हथियार ही इनकी जिंदगी का पूरा सच नहीं है। ये भी बदलना चाहते हैं, इसका सबूत स्कूलों की बसें हैं। ये लोग सीना ठोंक कर कहते हैं- हम 5-5 हजार रुपए में हथियार बनाते हैं। जब बैठकर बात की, तो पुलिस प्रताड़ना और समाज से दुत्कार की कहानी सामने आई। कभी राजा- महाराजाओं के लिए अधिकृत रूप से हथियार बनाने का काम करने वाले सिकलीगर कहते हैं कि हम समाज की मुख्यधारा में आना चाहते हैं, लेकिन कोई काम तो दे। जब काम नहीं मिलता, तो पेट पालने के लिए हथियार बनाने ही पड़ते हैं। सिकलीगरों के गांव उमर्टी से पढ़िए यह रिपोर्ट-


5 हजार में बेचते हैं, जिसे दलाल 25 हजार में बेचता है
हमने सीधा सवाल किया- एक हथियार बनाने में कितना समय लगता है? जवाब मिला- एक पिस्टल बनाने में 15 से 20 दिन लगते हैं। 5 हजार रुपए में बिकती है। इस हिसाब से आप खुद तय कर लीजिए, कितने पैसे मिलते होंगे हमें। उन्होंने बताया कि यह कीमत तो अभी बढ़ी है वरना पहले तो केवल ढाई हजार रुपए में ही हथियार बना देते थे। 5 हजार में पिस्टल खरीदने वाला एक बिचौलिया या दलाल होता है, जो दूसरे राज्यों में जाकर इसे 20 से 25 हजार रुपए में बेचता है।
साइकिल के फ्रेम और लोहे के पट्टे से बनती है पिस्टल
सिकलीगरों ने बताया कि वे साइकिल के पुराने फ्रेम और ट्रक की कमानी और पट्टे कबाड़ से खरीदते हैं। यही कच्चा माल होता है। लोहे को गलाकर साइज में ढाला जाता है। इसके बाद शुरू होता है उसको आकार देने का काम। इसके लिए 2 इंच से लेकर 5 इंच तक की आरियां होती हैं। इन्हीं आरियों से दिन-दिन भर घिसाई होती है। छोटे स्क्रू के लिए होल करने का काम भी इन्हीं आरियों से होता है। पिछले कुछ दिनों से ग्राइंडर की भी मदद ली जा रही है। इसके लिए कोई कारखाना नहीं होता, बस घर के एक कमरे में बैठकर छोटी-छोटी आरियां ही इनके औजार होते हैं। पटटे से ये पिस्टल का हत्था बनाते हैं। पाइप से बंदूक की नाल बनाते हैं। ट्रिगर के लिए पूरा काम आरियों की घिसाई से होता है। 10 दिन में शेप देने का काम पूरा होता है। फिर इसकी फिनिशिंग होती है। मेड इन यूएसए और मेड इन चाइना की टैगिंग होती है, ताकि ये देखने में हुबहू असली लगे।

सिकलीगर हथियार बनाने में मुख्य रूप से छोटी-छोटी आरियों का उपयोग करते हैं। इसके लिए उनके पास कई आकार की आरियां होती हैं। बाकी पूरा काम हाथ से करते हैं। घिसाई के लिए कुछ सिकलीगर इन दिनों ग्राइंडर का उपयोग करने लगे हैं, लेकिन बिजली गुल होने के डर से अपने हाथ पर ही ज्यादा भरोसा करते हैं।
दलाल ही होते हैं ज्यादातर ग्राहक
सिकलीगरों के गांवों के नाम इस दुनिया से ताल्लुक रखने वालों के लिए नए नहीं है। जो भी हथियारों की खरीदी बिक्री से जुड़े लोग हैं, वे इन गांवों का नाम-पता अच्छे से जानते हैं। वे लोग सीधे यहां पहुंचकर स्थानीय लोगों की मदद लेते हैं या दलाल के मार्फत संपर्क करते हैं। यदि कोई दूसरे राज्य की नई गाड़ी इस क्षेत्र में नजर आई, तो पुलिस उसकी निगरानी शुरू कर देती है। कोई गाड़ी यदि रात में यहां आसपास ठहरी यानी वो ज्यादा बड़ा संदिग्ध होता था। जैसे ही, इनके पास सामान (हथियार) पहुंचता, पुलिस इन्हें दबोच लेती है। दलाल पुलिस को चकमा देकर या सेटिंग करके अपना सामान ले जाता है। हमारा रोल बस इतना ही है।

सिकलीगरों का कहना है कि दलाल या ग्राहक हम से संपर्क करता है, तो उसे हथियार बनाकर देते हैं, लेकिन मार्केट में प्रचार करके हम रूटीन काम नहीं करते हैं।
… लेकिन हथियार बनाना तो अवैध काम है
हां…बिल्कुल लेकिन सभी लोग हथियार नहीं बनाते हैं। दिक्कत तो यही है कि यदि हम इस काम से अलग होना चाह रहे हैं, लेकिन कोई मदद नहीं करता। कई लड़के वेल्डिंग की दुकान पर काम करते हैं। कई दूसरे प्राइवेट काम करते हैं। मजदूरी करते हैं। हथियार बनाते हैं। इसी ग्रुप से एक बंदा कहता है क्या कभी हत्या-लूट में हमारा नाम आया क्या? आप ही सोचिए, हम हथियार बनाना जानते हैं तो उसका उपयोग करना भी जानते ही होंगे, लेकिन न तो आज तक हमारे समुदाय ने कभी किसी से न तो लूट की न तो कभी किसी की अस्मत पर हाथ डाला।
लोन मांगो तो बैंकवाले कहते हैं- गारंटर लेकर आओ
हमारे बच्चे यदि अपना काम शुरू करना चाहते हैं, तो उन्हें लोन नहीं मिलता। सरकारी अफसर तो कह देते हैं कि लोन मिल जाएगा, लेकिन बैंकवाले गारंटर मांगते हैं। फिर हम वहीं खड़े हो जाते हैं। यदि हम हथियार बनाना जानते हैं, तो आर्म्स फैक्ट्री में हमें नौकरी क्यों नहीं मिलती।

उमर्टी गांव के लोगों का आरोप है कि पुलिस बेवजह उन्हें परेशान करती है। 8 सितंबर को इसी उमर्टी गांव में बड़वानी पुलिस ने छापा मारकर 51 हथियार बरामद करने का दावा किया है। इस छापे पर गांववालों का कहना है कि यहां से तो केवल दो ही हथियार बरामद हुए थे। वे कहते हैं कि यदि पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े करेंगे तो जमानत में भी दिक्कत आएगी।
कोई गाड़ी आ जाए, तो खाना छोड़कर भागना पड़ता है
इंदौर सिंह कहते हैं कि हमारा पूरा समाज डर के साए में जीता है। डर इतना लगता है कि यदि हम खाना खा रहे हैं। इस बीच यदि खबर मिल जाए कि गांव में कोई गाड़ी आई है, तो हमें खाना छोड़कर भागना होता है।
150 आदिवासियों के पक्के मकान मंजूर, सिकलीगर के लिए एक भी नहीं
गांव के उपसरपंच जालम सिंह कहते हैं कि इस गांव में अभी 150 आदिवासियों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 150 पक्के घर मंजूर हुए हैं, लेकिन सिकलीगर के लिए एक भी मकान नहीं मिला है। आप हमसे कहते हैं कि समाज की मुख्य धारा में शामिल हो जाइए, लेकिन भेदभाव आप खुद करते हैं। हमारे पास वोटर आईडी है, हम वोट देते हैं। सरपंच चुनते हैं, लेकिन सरकारी सुविधाएं नहीं मिलती। हमें ऐसी नजरों से देखा जाता है, जैसे हम आतंकी हों, अछूत हों।
अर्जुन सिंह से लेकर शिवराज सिंह तक सबसे मिले, लेकिन कुछ नहीं हुआ
सिकलीगरों की समस्याएं बताते हुए उपसरपंच कहते हैं कि हम सीएम अर्जुन सिंह के कार्यकाल से अपनी बात रख रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान से 4 बार मिल चुके हैं। सिर्फ आश्वासन मिलते हैं, जमीन पर कुछ नहीं उतरता। यदि हम सुधरना भी चाहें ताे कैसे सुधरें, आप ही बताइए।

गुरुद्वारा कमेटी की मदद से सिकलीगरों के 150 बच्चे तीन बसों से रोज स्कूल आ जा रहे हैं। यह बसें बताती हैं कि यदि इन्हें मदद मिले तो ये हथियार बनाने का काम छोड़ सकते हैं।
उनका दोष बस ये है कि वे हमारे बच्चे हैं
हमारा गांव तो पूरे देश में अवैध हथियारों के लिए बदनाम है। अभी भी कई लोग इस गांव के जेल में हैं। आधी रात को पुलिस छापा मारने आती है, जो हथियार बनाते हैं। उनसे हथियार मिलते भी होंगे। उस रात को गांव में जो हाथ आता है, उसे ही आरोपी बना लिया जाता है। हमारे घर के जवान लड़के जो पढ़ लिखकर अच्छा आदमी बनना चाहते हैं। वो भी इन छापों में पिस जाते हैं। उनका दोष बस यही है कि वे हमारे बच्चे हैं? वे पढ़ना चाहते हैं।
आरोप है कि सिद्धू मूसेवाला की हत्या वाले हथियार भी यहीं से गए थे
सवाल पूरा होने से पहले ही गुस्से में इंदौर सिंह कहते हैं कि आप मीडिया वाले पुलिस से क्यों नहीं पूछते? पुलिस वाले 2 हथियार मिलते हैं, तो उनको 50 बता देते हैं। अगर हम इतनी मात्रा में हथियार बनाते तो इन खपरैल वाले मकानों में क्यों रहते है? अपना मकान बनाने के लिए सरकार से भीख क्यों मांगते? अपने बच्चों की फीस का खर्च खुद क्यों नहीं उठाते? हमारे बच्चे पैसों के अभाव में बीच में पढ़ाई क्यों छोड़ते हैं? हमारे बच्चे स्कूल जाना चाहते हैं, तभी तो ये स्कूल बसें भरकर आ जा रही हैं। ऐसी 3 बसें यहां से 150 बच्चों को स्कूल लाती- ले जाती है। हमारे पास तो इतने पैसे भी नहीं है कि बच्चों को स्कूल भेज सकें। गुरुद्वारा ट्रस्ट इन बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाता है।

मध्यप्रदेश के धार, खरगोन, बड़वानी और बुरहानपुर इन चार जिलों में कोई 8 से 10 हजार आबादी है सिकलीगरों की। जाहिर है सारे लोग हथियार बनाने का काम नहीं करते। लेकिन ये भी सच है कि 30 प्रतिशत सिकलीगर इस काम से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। अन्य ताला-चाबी और वेल्डिंग के कामों से जुड़े हैं। छोटी जोत होने के चलते ये खेती भी नहीं कर सकते। खुद का काम-धंधा करना चाहें तो बैंक वालों से ऋण तक नहीं मिलता। आखिर बैंक में क्या बंधक रखें।
एमपी और महाराष्ट्र में फैले उमर्टी गांव को अनेर नदी करती है विभाजित
महाराष्ट्र के जलगांव और बड़वानी के आखिरी गांव उमर्टी को अनेर नदी विभाजित करती है। नदी के दोनों ओर उमर्टी गांव बसा हुआ है। दोनों गांवों को जोड़ने के लिए अनेर नदी पर एक रपटा वाला पुल बना हुआ है, बारिश के दिनों में यह भी डूब जाता है। हम घेगांव होते हुए उमर्टी पहुंचे थे। घेगांव भी सिकलीगरों का गांव है। यहां भी पुलिस की कार्रवाई होती रहती है। हालांकि यहां कोई हमसे बात करने को तैयार नहीं हुआ। उमर्टी में कोई 400 घरों वाली दो हजार की आबादी रहती है। सरपंच जालम सिंह कहते हैं कि हम बदलना चाहते हैं, सरकार रोजगार तो दे।

सतनाम सिंह, हरपाल सिंह व राजकुमार कहते हैं कि हम एमबीए, एमफार्मा कर रहे हैं लेकिन जब भी किसी सिकलीगर की गिरफ्तारी होती है तो हमारे साथ पढ़ने वाले हमसे नजरें चुराते हैं। वो हमसे बात करना पसंद नहीं करते। यदि हम सुधरना भी चाहें भी तो कैसे सुधरें।
लोग कहते हैं हम क्रिमिनल हैं
यहां के युवा कहते हैं कि हमारे साथ 12-15 साल से पढ़ने वाले क्लासमेट भी खबरें पढ़कर हमसे घृणा करने लगते हैं। आम लोगों को तो मीडिया बता रहा है। लोग कहते हैं कि हम क्रिमिनल हैं। मीडिया कभी प्रशासन से सवाल नहीं करता कि ये हथियार कहां से आए? इसलिए मार्केट में हमारी 100 रुपए की वैल्यू नहीं है। श्रद्धा कौर कहती हैं कि पुलिस जब छापा मारती है, तो स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले लड़कों को भी उठा ले जाती है। जो गुनहगार नहीं है, उन्हें भी ले जाते हैं।

ग्राफिक्स: विशाल शर्मा
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