गंभीर किडनी रोगियों के लिए बड़ी राहत: ICU में भर्ती मरीजों की जान बचा सकती है स्टैटिन थेरेपी, स्टडी में 52% तक मौत का खतरा घटने का दावा

डेस्क । दुनियाभर में किडनी की गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। कई मामलों में स्थिति इतनी नाजुक हो जाती है कि मरीजों को इलाज के लिए आईसीयू में भर्ती करना पड़ता है, जहां जान का खतरा काफी अधिक होता है। इसी बीच इस दिशा में एक नई और अहम उम्मीद सामने आई है। अमेरिका में की गई एक बड़ी ऑब्जर्वेशनल स्टडी में यह पाया गया है कि गंभीर किडनी रोग से जूझ रहे मरीजों के लिए स्टैटिन थेरेपी बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है।
यह रिसर्च यूरोपियन जर्नल और साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित की गई है। अध्ययन के मुताबिक, अगर आईसीयू में भर्ती गंभीर किडनी रोगियों को स्टैटिन थेरेपी दी जाए, तो 30 दिनों के भीतर मृत्यु का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है। शोध में यह भी सामने आया है कि ऐसे मरीजों में इंट्रासेरेब्रल हैमरेज यानी ब्रेन ब्लीड की समस्या का खतरा अधिक रहता है, जो एक जानलेवा स्थिति मानी जाती है। स्टैटिन दवाएं इस खतरे को कम करने में भी मदद कर सकती हैं।
इस अध्ययन में करीब 1,900 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जो गंभीर किडनी बीमारी से पीड़ित थे और आईसीयू में भर्ती थे। इनमें से 654 मरीजों को आईसीयू में इलाज के दौरान स्टैटिन थेरेपी दी गई, जबकि शेष मरीजों को यह दवा नहीं दी गई। रिसर्च के नतीजों में स्पष्ट रूप से देखा गया कि जिन मरीजों को स्टैटिन दी गई, उनमें 30 दिनों के भीतर मृत्यु दर काफी कम रही। कुल मिलाकर स्टैटिन थेरेपी से मौत का खतरा लगभग 52 प्रतिशत तक घट गया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि स्टैटिन केवल कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा नहीं है, बल्कि इसके कई अन्य लाभ भी हैं। यह शरीर में सूजन को कम करने, रक्त नलिकाओं की कार्यक्षमता सुधारने और एक्यूट किडनी डिजीज व ब्रेन ब्लीड जैसी गंभीर स्थितियों में भी सकारात्मक प्रभाव दिखा सकती है। यही वजह है कि गंभीर किडनी रोगियों के इलाज में इसे एक सहायक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
स्टैटिन थेरेपी शुरू करने से पहले डॉक्टर मरीज की पूरी मेडिकल स्थिति का आकलन करते हैं। इसमें लिपिड प्रोफाइल, हार्ट से जुड़े टेस्ट और किडनी फंक्शन की जांच शामिल होती है। आईसीयू में भर्ती मरीजों की हालत को पहले स्थिर किया जाता है, इसके बाद उनकी स्थिति के अनुसार उपयुक्त स्टैटिन दवा का चयन किया जाता है। आमतौर पर इलाज की शुरुआत कम डोज से की जाती है। यह दवा मरीज को मुंह से या फीडिंग ट्यूब के जरिए दी जा सकती है।
हालांकि विशेषज्ञों का साफ कहना है कि हर मरीज के लिए स्टैटिन थेरेपी जरूरी नहीं होती। इसे शुरू करने का फैसला मरीज की व्यक्तिगत मेडिकल स्थिति, अन्य बीमारियों और जोखिमों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए। इसके बावजूद यह रिसर्च गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे मरीजों के इलाज में एक नई दिशा और नई उम्मीद के रूप में देखी जा रही है, जो भविष्य में कई जानें बचाने में मददगार साबित हो सकती है।




