Chhattisgarh

कोरबा: जंगल में प्यासे वन्य प्राणी, योजनाओं में बहा पैसा: मड़वारानी क्षेत्र में जल व्यवस्था ठप

कोरबा, 18 अप्रैल 2026। जिले के वन क्षेत्रों में वन्य प्राणियों के लिए पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चलाई जा रही योजनाएं कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं। ग्राम मड़वारानी-खरहरी के जंगल में स्थिति यह है कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद गर्मी के दिनों में जानवरों को पानी की एक बूंद तक नसीब नहीं हो पा रही है। इससे जंगली जानवर पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उनकी और ग्रामीणों की जान जोखिम में पड़ रही है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, वन विभाग द्वारा पूर्व में एक डैम का निर्माण कराया गया था, लेकिन गर्मी में वह पूरी तरह सूख जाता है। ऐसे में हिरण, चीतल सहित अन्य वन्य प्राणी पानी की तलाश में गांव की ओर पहुंचते हैं, जहां आवारा कुत्तों का शिकार बनकर उनकी मौत हो जाती है।

समस्या के समाधान के लिए वन मंडल कोरबा के अंतर्गत ग्राम पंचायत पुरैना, वन परिसर बरपाली-महोरा, वन परिक्षेत्र करतला में वर्ष 2024-25 के तहत वन्य प्राणी प्रबंधन योजना स्वीकृत की गई थी। इस योजना में बोर खनन, सोलर पंप, पानी टंकी और पाइपलाइन निर्माण जैसे कार्य शामिल थे। इसके लिए कक्ष क्रमांक पी-1164, पी-1165 सहित अन्य क्षेत्रों में कार्य प्रस्तावित किया गया था।

2 जुलाई 2024 को वन प्रबंधन समिति पुरैना की बैठक में भी इन कार्यों को मंजूरी दी गई थी, जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया था कि पानी के अभाव में वन्य प्राणी जंगल छोड़कर बाहर आ रहे हैं और शिकार हो रहे हैं। बावजूद इसके, दो वर्षों के बाद भी योजना अधूरी पड़ी है और धरातल पर कोई ठोस परिणाम नजर नहीं आ रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि योजना में भारी अनियमितता बरती गई है और राशि का बंदरबांट कर केवल खानापूर्ति की गई है। इधर, वन्य प्राणी प्यास से भटक रहे हैं, वहीं जिम्मेदार अधिकारी उदासीन बने हुए हैं।

इस पूरे मामले में वन विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। पूर्व में भी कई योजनाएं अधूरी रहने और राशि खर्च होने के मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन जांच के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई जाती है। दोषियों पर न तो ठोस कार्रवाई होती है और न ही राशि की वसूली।

ऐसे हालात में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या योजनाओं का उद्देश्य केवल बजट खर्च करना भर रह गया है, जबकि जमीनी स्तर पर उसका लाभ न तो वन्य प्राणियों को मिल पा रहा है और न ही पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य पूरे हो रहे हैं।

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