कोरबा के बहुचर्चित अपहरण – फिरौती व हत्या का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, राज्य सरकार को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

कोरबा। कोरबा के बहुचर्चित व दिल दहला देने वाला मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। पीड़ित पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी है। डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को सुनाई गई आजीवन कारावास के फैसले को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य शासन को नोटिस जारी कर शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। इसके लिए चार सप्ताह की मोहलत राज्य सरकार को दी है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए मुकेश कुमार बैरागी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय करोल व जस्टिस के. विनोद चंद्रन की डिवीजन बेंच में हुई।
बता दें, याचिकाकर्ता ने विलंब से एसएलपी दायर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से माफी भी मांगी है, मानवीय आधार को सामने रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विलंब से एसएलपी दायर करने को माफ करते हुए विशेष अनुमति याचिका को दाखिल करने की अनुमति दी है और सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार व अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य शासन के अधिवक्ता को एक सप्ताह के भीतर याचिका की एक प्रति तामिल करने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को दिया है। डिवीजन बेंच ने निर्देशित किया है, प्रतिवादी को अगली सुनवाई की तारीख से पहले अपना शपथ पत्र और अंतरिम आवेदन (यदि कोई हो) का जवाब दाखिल करना आवश्यक है। इसके लिए कोर्ट ने चार सप्ताह की मोहलत दी है।
16 मई 2013 को शिकायतकर्ता मुकेश कुमार बैरागी ने अपने 6 वर्षीय बेटा भूपेश अलीसा अप्पू के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उरगा पुलिस स्टेशन में गुमशुदा का मामला दर्ज किया। 17 मई 2013 को शाम 7 बजे किसी अज्ञात व्यक्ति ने नाबालिग के दादा जगदीश दास वैष्णव को उनके मोबाइल नंबर पर फोन किया और अपहृत बच्चे की रिहाई के बदले 10 लाख रुपये की फिरौती मांगी।
कॉल डिटेल से पता चला, फिरौती के लिए किए गए कॉल में इस्तेमाल किया गया सिम अमित नाम के व्यक्ति को जाली दस्तावेजों के आधार पर जारी किया गया था, पुलिस ने दुकानदार सोहन लाल गुप्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 और 467 के तहत एक अलग मामला दर्ज किया गया। आरोपी से संबंधित पाए जाने पर, उरगा पुलिस ने आईपीसी की धारा 363 और 364 के तहत एफआईआर संख्या 72/13 दर्ज की। उक्त मोबाइल नंबर की कॉल डिटेल्स एकत्र की गईं और आरोपी को 17 मई.2013 को गिरफ्तार किया गया। आरोपी अरुण कुमार वैष्णव ने खुलासा किया कि आर्थिक तंगी और बच्चे के संपन्न परिवार को अपमानित करने के इरादे से उसने बच्चे का अपहरण किया, फिरौती की मांग की, गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी और शव को एक स्टोर रूम में छिपा दिया। पंचनामा तैयार किया गया, शव बरामद कर, पोस्टमार्टम के बाद शव परिवार को सौंप दिया गया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने ये दिया तर्क
मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता अरुण कुमार वैष्णव कोरबा के वकील का कहना है, निचली अदालत द्वारा दिया गया फैसला अवैध, मनमाना और अनुमानों पर आधारित है, इसलिए कानून की दृष्टि से मान्य नहीं है। याचिकाकर्ता निर्दोष है और उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया है। उनका यह भी कहना था, अभियोजन पक्ष ने यह दिखाने की कोशिश की है कि शव याचिकाकर्ता के कहने पर बरामद किया गया था, लेकिन यह दावा अत्यंत संदिग्ध है।
अभियोजन पक्ष ने जिन दो सिम नंबरों के बीच हुई बातचीत से संबंधित कोई कॉल डिटेल रिकॉर्ड एकत्र नहीं किया है। इन परिस्थितियों में, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी रह जाती है। फिर भी, निचली अदालत इन पहलुओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझने में विफल रही और परिणामस्वरूप गलत फैसला सुनाया। इसलिए, विवादित निर्णय को रद्द किया जाना चाहिए।
याचिका की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे व जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच में हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, जांच प्रक्रिया में बरती गई खामियां, जिनमें शव बरामद होने का समय दर्ज न करना और आवश्यक दस्तावेज तैयार न करना शामिल है, अभियोजन पक्ष के मामले की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करती हैं। ये चूकें परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से अपीलकर्ता के अपराध को साबित करने के अभियोजन पक्ष के प्रयास की जड़ पर प्रहार करती हैं। किसी मामले में, जो पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हो, साक्ष्यों की प्रत्येक कड़ी को सुदृढ़ रूप से स्थापित किया जाना चाहिए और आरोपी के अपराध की ओर स्पष्ट रूप से इंगित करना चाहिए, जिससे निर्दोषता से संबंधित हर परिकल्पना को खारिज किया जा सके।
वर्तमान मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियां न केवल अपूर्ण हैं बल्कि कानूनी रूप से भी अस्वीकार्य हैं। कोई मकसद साबित नहीं हुआ है। क्रिकेट खेलने जैसी मामूली घटना के अलावा अंतिम बार देखे जाने का कोई सबूत स्थापित नहीं हुआ है। आरोपी के कहने पर शव की बरामदगी साबित नहीं हुई है। कोई भी स्वीकार्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य आरोपी को कथित फिरौती कॉल या संबंधित मोबाइल फोन से नहीं जोड़ता है। उपरोक्त कमियों के आलोक में, अभियोजन पक्ष अपने मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। अतः अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने का हकदार है। परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की जाती है। निचली अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि का निर्णय और सजा का आदेश रद्द किया जाता है। अपीलकर्ता को संदेह का लाभ देते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 364ए, 302 और 201 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी किया जाता है।
निचली अदालत से सुनाई थी आजीवन कारावास की सजा
आईपीसी की धारा 363 के तहत, सात साल का कठोर कारावास और 1,000 रुपये का जुर्माना; जुर्माना न भरने पर दो महीने का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा।
आईपीसी की धारा 364ए के तहत,आजीवन कारावास और 5,000 रुपये का जुर्माना; जुर्माना न भरने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा।
आईपीसी की धारा 302 के तहत, भुगतान न करने पर आजीवन कारावास और 5,000 रुपये का जुर्माना, जुर्माना राशि, एक वर्ष के लिए अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
आईपीसी की धारा 201 के तहत,5 वर्ष का कठोर कारावास और 1,000 रुपये का जुर्माना; जुर्माना न भरने पर दो महीने का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा।




