अधिवक्ता कमलेश साहू सहित 4 पर न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज

कोरबा, 26 सितम्बर। जमीन के प्रकरण से जुड़े एक मामले में न्यायालय के द्वारा सुरेश चन्द्र तिवारी एवं सुधा तिवारी के विरुद्ध दिए गए फैसले के खिलाफ की गई अपील में अधिवक्ता कमलेश साहू एवं जूनियर अधिवक्ता जोगिंदर साहू के द्वारा न्यायाधीश और उनके कर्तव्य को लेकर अनेक तरह की अनर्गल और अवांछनीय टिप्पणियां की गई हैं जिससे न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंची है। इस मामले में जिला अभियोजन अधिकारी एस के मिश्रा के आवेदन पर न्यायालय में इन चारों के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना का आपराधिक प्रकरण MJC (क्रिमिनल) 140/2025 दर्ज कर लिया गया है। 17 अक्टूबर 2025 को पेशी की तारीख नियत की गई है।
मिली जानकारी के मुताबिक दिनांक 06 मई 2025 को पीठासीन न्यायाधीश मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी सत्यानंद प्रसाद के द्वारा तिवारी दंपत्ति (अपीलार्थीगण) को 3-3 वर्ष के कठोर कारावास साथ ही 20-20 हजार के अर्थदंड से दण्डित करते हुए प्रार्थी को 25,50,000/- रूपये तीन माह के भीतर प्रतिकर के तौर पर धारा 357ए दंप्रसं के तहत में प्रदाय किये जाने का आदेश पारित किया है।”
इसके विरुद्ध जिला एवं सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में अपील
ज्ञापन प्रस्तुत किया गया है। इस अपील में पीठासीन न्यायाधीश सत्यानंद प्रसाद पर – एक पक्षीय, पूर्वाग्रह से ग्रस्त, अपीलार्थीगण की कोई बात नहीं सुनना, मदन मिश्रा एवं जगदीश मिश्रा के प्रभाव में आकर अपीलार्थीगण के विरूद्ध फैसला सुनाने, विधि में प्रावधानित एवं आच्छादित कानूनों के बाहर जाते हुए अपने निर्णय में सिर्फ एक विवेचक का कार्य करने, एक विवेचना अधिकारी का कार्य करने जैसे कई तरह की टिप्पणी अनेक कंडिकाओं में की है।
👉🏻 डीपीओ ने कहा आवेदन में…
प्रस्तुत अपील में की गई टिप्पणियों को अत्यधिक गंभीर किस्म के, आधारहीन, अपमानजनक तथा लांछनकारी बताते हुए डीपीओ (जिला अभियोजन अधिकारी) ने कहा है कि अनर्गल शब्दों का प्रयोग करते हुये तथ्यविहीन आरोप लगाये गये हैं जो न्यायालय के प्राधिकार पर लांछन लगाने तथा न्यायालय के प्राधिकार को कम करने जैसा है। उक्त प्रकरण में इस न्यायालय में लंबित मूल दांडिक प्रकरण कं. 2912/2022, छ.ग. राज्य विरूद्ध सुरेशचंद तिवारी एवं अन्य, धारा 420, 120 (बी) भारतीय दण्ड संहिता में संपूर्ण साक्ष्य लेखबद्ध कर तथा आरोपीगण को बचाव साक्ष्य का अवसर देते हुये संपूर्ण अभिलेख के अवलोकन उपरांत गुण-दोष के आधार पर आरोपीगण सुरेशचन्द्र तिवारी एवं उसकी पत्नी श्रीमती सुधा तिवारी को दोषसिद्ध किया गया था तथा आरोपीगण धारा 389 द.प्र.सं. का लाभ देते हुये जमानत पर रिहा भी किया गया था। उसके पश्चात आरोपीगण की ओर से उक्त अपील सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई थी। अपील प्रस्तुत करना आरोपी और पीड़ित का कानूनी अधिकार है। अपील के ज्ञापन में अपील का आधार विचारण न्यायालय द्वारा की गई विधि और तथ्य की त्रुटि, प्रक्रियात्मक त्रुटि, साक्ष्य की कमी या सबूतों की गलत व्याख्या इत्यादि होता है। अपील के ज्ञापन पर विचारण न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश पर व्यक्तिगत, लांछनकारी एवं अपमानजनक टिप्पणियां नहीं की जा सकती किन्तु इस मामले में विचारण न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश का व्यक्तिगत नाम लिखते हुये बिना किसी लांछनकारी तथा अपमानजनक आक्षेप निर्णय सुनाये जाने के पश्चात लगाया गया है।
👉🏻दाण्डिक अवमानना के दायरे में
डीपीओ ने कहा है कि उक्त अपील का ज्ञापन आरोपी सुरेशचंद तिवारी एवं सह आरोपी श्रीमती सुधा तिवारी की ओर से अधिवक्ता कमलेश साहू द्वारा हस्ताक्षर कर अधिवक्ता जोगेन्दर साहू द्वारा पेश किया गया है। उक्त अपील के ज्ञापन में उपयोग किये गये शब्द एवं टिप्पणियां निश्चित रूप से न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(ग) के अंतर्गत दांडिक अवमानना की परिभाषा में आता है। अतः उपरोक्त अवमानकर्तागण के विरूद्ध प्रकरण में प्रथमदृष्ट्या इस न्यायालय के अनुसार धारा 10 न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के अंतर्गत कार्यवाही किये जाने के लिये पर्याप्त आधार विद्यमान है। अवमानकर्ता अधिवक्ता कमलेश साहू, अधिवक्ता जोगेन्दर साहू, आरोपी सुरेशचंद तिवारी एवं सह आरोपी श्रीमती सुधा तिवारी के विरूद्ध धारा 10 न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के अंतर्गत विविध दांडिक प्रकरण (एम.जे.सी.) पंजीबद्ध किए जाने के डीपीओ के आवेदन पर क्रिमिनल अपराध 140/2025 दर्ज कर लिया गया है।
👉🏻 नोटिस जारी की गई
साथ ही उपरोक्त अवमानकर्तागण के विरूद्ध धारा 15 (2) न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के अंतर्गत निर्देश उच्च न्यायालय बिलासपुर को प्रेषित किये जाने के पूर्व कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है कि उनके विरूद्ध धारा 10 न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के अंतर्गत दंडित किये जाने हेतु निर्देश धारा 15 (2) न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971 के अंतर्गत उच्च न्यायालय बिलासपुर व प्रेषित क्यों न की जावे। डीपीओ ने बताया कि इसके पहले भी विचारण न्यायालय पर अधिवक्ता कमलेश साहू के द्वारा टिप्पणी किया गया था जिसमें अवमानना की चेतावनी देने पर माफी मांगीं गई। अब इस प्रकरण में सजा हो जाने पर तार्किक अपील तथ्यों के साथ करने की बजाय अनर्गल टिप्पणी की गई है।
👉🏻इस तरह मामले का पता चला
पीठासीन न्यायाधीश के विरुद्ध की गई अनर्गल टिप्पणियों का खुलासा तब हुआ जब उक्त प्रकरण में अधिवक्ता कमलेश साहू, जोगेंद्र साहू के द्वारा जिला एवं सत्र न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की गई। अपील का अवलोकन अतिरिक्त लोक अभियोजक कृष्ण कुमार द्विवेदी के द्वारा किया गया और जब उनके संज्ञान में यह बात आई तो उन्होंने उक्त तथ्यों से अपील की प्रति सहित जिला लोक अभियोजक निदेशालय,कोरबा को पत्र लिखकर अवगत कराया। डीपीओ एस के मिश्रा ने अपील में की गई टिप्पणियों का अवलोकन करने के पश्चात पीठासीन न्यायाधीश (जेएमएफसी) सत्यानंद प्रसाद के न्यायालय में अवमानना का आवेदन प्रस्तुत किया, इसके पश्चात आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की कार्रवाई हुई है।










