Chhattisgarh

समस्त योनियों में मनुष्य योनि सबसे दुर्लभ – डॉ० स्वामी युगल शरण

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

चाम्पा – भगवान को जानकर ही जीव माया से उतीर्ण हो सकता है। और इन जीवात्माओं में केवल मनुष्य ही भगवान को जान सकता है। भगवान को जानने से हमको माया से छुटकारा मिलेगा। हम जब माया पर विजय प्राप्त कर लेंगे , तब हमारा काम बन जायेगा , हमको शांति मिलेगा , हम तृप्त हो जायेंगे। माया भगवान की शक्ति है , इसलिये भगवान के कृपा बिना हम माया से उत्तीर्ण नहीं हो सकेंगे।

उन्होंने आगे बताया कि चौरासी लाख प्रकार की शरीरों में से एकमात्र मनुष्य शरीर से ही भगवान को जाना जा सकता है , प्राप्त किया जा सकता है। जीव भगवान के अंश है। इसलिये मनुष्य शरीर पाकर यदि भगवान को नहीं जाना तो बहुत बड़ी हानि होगी और फिर करोड़ों कल्प तक मनुष्य शरीर नहीं मिलेगा और चौरासी लाख प्रकार योनियों में भटकना पड़ेगा।


उक्त बातें कोसा , कांसा और कंचन की नगरी में ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित जगद्गुरुत्तम स्वामी श्री कृपालुजी महाराज के प्रमुख प्रचारक डॉ स्वामी युगल शरणजी ने विलक्षण दार्शनिक प्रवचन के शुभारंभ में आज प्रथम दिवस कही। सर्वप्रथम आश्रमवासी सदस्य सौरभ कुमार (आईआईटी खड़कपुर) ने मंच संचालन करते हुये स्वामी के विषय में संक्षिप्त परिचय दिया तत्पश्चात स्वागत हुआ। स्वागत के बाद पूज्य स्वामी जी को मंच समर्पित किया गया और वे अपने चिर परिचित अंदाज और शैली में प्रवचन प्रारंभ किया। स्वामीजी ने आगे बताया कि आहार , निंद्रा , भय और विषयभोग जैसे मनुष्य में है वैसे हीं पशुओं में भी पाये जाते हैं । पशु-पक्षियों को भगवान नेचुरल ज्ञान दिया है , लेकिन अच्छे-बुरे की सोच-विचार पशु-पक्षियों के पास नहीं है। जगदगुरु कृपालु महाप्रभु ने कहा कि इस चीज में मनुष्य पशु-पक्षियों से बदतर है। फिर भी मानव शरीर सबसे श्रेष्ठ क्यों है , क्योंकि मानव शरीर कर्म प्रधान और ज्ञान प्रधान है। उन्होंने रामचरित मानस के बड़े भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सदग्रंथनि गावा का उदाहरण देते हुये कहा कि कृपा करके भगवान ने हमको मनुष्य शरीर दिया है और यह मनुष्य शरीर अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि मनुष्य के पास ऐसा ज्ञान है कि वह सोच सकता है , योजना बना सकता है , याद रख सकता है , कल्पना कर सकता है। वह क्या नहीं कर सकता ? और पशु-पक्षी को थोड़ा ज्ञान है , जिससे वह जीवित रह सकें। यह ज्ञान रुपी शक्ति भगवान ने मनुष्य को प्रदान की है। रामायण में काकभुशुण्डि – गरुड़ संवाद में यह वर्णन है कि मनुष्य शरीर सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान है। एक बार यदि आपको देह के दुर्लभत्व का पता चल जाये , किसी भी वस्तु का मूल्य का ज्ञान हो जाये , आपको पता चल जाये कि यह वस्तु मूल्यवान है , तो फिर आप उस वस्तु के प्रति लापरवाही नहीं कर सकते। यह आपके लिये महत्वपूर्ण हो जायेगा। स्वामीजी ने बताया स्वर्ग के देवी-देवता भी मनुष्य शरीर चाहते हैं , पर मनुष्य शरीर देव दुर्लभ है। देवताओं के शरीर में क्या विशेषता है ? देवताओं के शरीर दिव्य यानी तेजस् है , ज्ञान का भंडार है , शरीर से खुशबू निकलता है , भूख-प्यास नहीं लगती है , उनका शरीर भूमि को स्पर्श नहीं करता , मल-मूत्र पसीना का निर्गमन नहीं होता , पलक नहीं भंजतीं आदि , देवताओं के शरीर में कितनी बड़ी-बड़ी बातें हैं। परंतु मनुष्य शरीर की ऐसी क्या विशेषता है कि इसको पाने के लिये देवतागण भी लालायित रहते हैं ? मनुष्य शरीर तो नवद्वारयुक्त है , रोम-रोम से मल निकल रहा है , इतना गंदा है। फिर भी मनुष्य शरीर क्यों इतना महत्वपूर्ण है और देवता भी मनुष्य शरीर चाहते हैं। मनुष्य के पास एक बड़ी विशेष बात है जो देवताओं के पास नहीं है। उन्होंने बताया कि मनुष्य शरीर ऐसा है कि जो पाना चाहेंगे , मिल जायेगा। स्वर्ग , नरक , मोक्ष जो भी चाहे पाया जा सकता है। देवता , पशु , पक्षी भोग योनि है। ये केवल भोग करते हैं , पुरुषार्थ करने की अधिकार नहीं हैं। जो लोग स्वर्ग प्राप्ति के लिये पुरुषार्थ करते हैं , शास्त्र में उनको प्रमूढ़ा या महामूर्ख कहा गया है। क्योंकि स्वर्ग में पुण्य का भोग करने के बाद उनको मृत्युलोक में नीचे की योनि में पटक दिया जाता है। मनुष्य कर्मयोनि है , पुरुषार्थयुक्त शरीर है। वह कर्म करके अपना भविष्य बना सकते हैं । भगवान की प्राप्ति हो सकता है , इसलिये मनुष्य शरीर सर्वश्रेष्ठ है। स्वामीजी ने कहा मानव शरीर का महत्व समझकर इसका सदुपयोग करना चाहिये , नहीं तो इसका दुरुपयोग अपने आप हो जायेगा। गर्भ में हम जब थे , हमने भगवान को वचन दिया था कि हम गर्भ से निकलने के बाद भक्ति हीं करेंगे। लेकिन हम भूल गये , उधार करते रहते हैं। मनुष्य शरीर इतना दुर्लभ और महत्वपूर्ण होने पर भी इसकी एक कमजोरी है- क्षण भंगुरता। एक क्षण का भी भरोसा नहीं , कब छिन जायेगा। सबसे बड़ा आश्चर्य है कि लोग प्रति क्षण मरते हैं , परंतु कोई नहीं सोचता है कि उनका भी कभी शरीर छिन जायेगा। इसलिये बुद्धिमानी यही है – मृत्यु से पूर्व अपनी लक्ष्य की ओर बढ़े ।

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