छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनिल टुटेजा को दी जमानत, लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी को माना आधार

बिलासपुर/रायपुर, 3 मार्च। कथित बहुचर्चित शराब घोटाला प्रकरण में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पूर्व वरिष्ठ अधिकारी अनिल टुटेजा को नियमित जमानत प्रदान कर दी है। Chhattisgarh High Court की एकलपीठ ने पारित विस्तृत आदेश में कहा कि जब ट्रायल के निकट भविष्य में पूरा होने की संभावना नहीं हो और आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हो, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति Arvind Kumar Verma की एकलपीठ में हुई। यह टुटेजा की दूसरी जमानत याचिका थी। इससे पहले उनकी जमानत अर्जी खारिज हो चुकी थी, लेकिन Supreme Court of India ने जांच की प्रगति को देखते हुए उन्हें पुनः जमानत याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी थी। उच्च न्यायालय ने माना कि आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद ट्रायल में प्रगति नहीं होने से परिस्थितियों में पर्याप्त परिवर्तन हुआ है।
अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि आवेदक 21 अगस्त 2024 से वर्तमान प्रकरण में न्यायिक हिरासत में है। इससे पूर्व वह प्रवर्तन निदेशालय की कार्यवाही में भी समान लेनदेन से जुड़े आरोपों में निरुद्ध रहा। कुल मिलाकर उसकी हिरासत अवधि लगभग 23 माह के आसपास पहुंच चुकी है। न्यायालय ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
मामले में अब तक सात आरोप पत्र प्रस्तुत किए जा चुके हैं। अभियोजन ने 51 व्यक्तियों को आरोपी बनाया है और 1,111 गवाहों को पेश करने का प्रस्ताव रखा है। दस्तावेजी साक्ष्य हजारों पृष्ठों में हैं। अदालत ने कहा कि इतनी व्यापक सुनवाई स्वाभाविक रूप से लंबा समय लेगी। वर्तमान स्थिति में न तो विशेष न्यायालय ने संज्ञान लिया है और न ही आरोप तय हुए हैं, क्योंकि अभियोजन स्वीकृति अभी लंबित है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब संज्ञान और आरोप गठन ही लंबित हों, तब ट्रायल प्रारंभ होने की समयसीमा अनिश्चित हो जाती है। ऐसे में आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत होगा।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि प्रकरण का साक्ष्य मुख्यतः दस्तावेजी है, जिसे जांच एजेंसी पहले ही जब्त कर चुकी है। आवेदक से किसी प्रकार की नकद राशि, अवैध संपत्ति या अन्य आपत्तिजनक सामग्री की बरामदगी नहीं हुई है। इस तथ्य को भी न्यायालय ने जमानत के पक्ष में प्रासंगिक माना।
अपने आदेश में न्यायालय ने दोहराया कि जमानत का सिद्धांत दंडात्मक नहीं बल्कि अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने का माध्यम है। केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर जमानत से इंकार नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब सुनवाई की प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित हो।
हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जमानत केवल लंबी हिरासत और ट्रायल में संभावित विलंब के आधार पर दी गई है। आदेश में आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है और पूर्व में पारित आदेशों में की गई टिप्पणियां अप्रभावित रहेंगी।
अदालत ने टुटेजा को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और सममूल्य जमानतदार प्रस्तुत करने पर रिहा करने का निर्देश दिया है। साथ ही पासपोर्ट जमा करने, जांच और ट्रायल में सहयोग करने, गवाहों को प्रभावित न करने तथा बिना अनुमति देश न छोड़ने जैसी शर्तें लागू की गई हैं। शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में अभियोजन को जमानत निरस्तीकरण के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गई है।




